स्वतंत्रता दिवस स्पेशल :  नोमहला कभी था आजादी के दीवानों का घर ,जानिए कब और कैसे बसा  नोमहला

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पम्मी वारसी की कलम से 

आज से ठीक पांच दिन बाद  15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस का दिन है इस दिन भारत को गुलामी की जंजीरों से आजादी मिली थी। लेकिन हम ये कभी नहीं भूल सकते कि ये आजादी हमें यूं ही नहीं मिली थी, बल्कि इसके लिए इस मातृभूमि के लाखों  जाने अनजाने अमर सपूतों ने अपने प्राणों की कुर्बानी दी थी और तब कहीं जाकर हमें अंग्रजों की गुलामी वाली जंजीरों से 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली थी।

बरेली का नोमहला 1857 के शहीदों की रहा था गढ़ 

1749 में शहीदे वतन रुहेला सरदार नवाब हाफ़िज़ रहमत खाँ ने बरेली में अधिकार किया तो पुनः उन्होंने नोमहला बसाया और अपने पिरोमुर्शिद सय्यद मासूम शाह को सौप दिया,1857 में नोमहला घनी आबादी का इलाका था,यहाँ बड़ी तादात में सय्यदो के परिवार बसे हुऐ थे और ये ‘नोमहल्लवी सय्यद’कहलाते थे| सय्यद मासूम शाह की औलादे ये सय्यद के परिवार क्रांतिकारियो की हर तरह से सहायता किया करते थे| शहीदे वतन नवाब खान बहादुर खान सूबेदार बख्त खान रिसालदार मोहम्मद शफ़ी और क्रांतिकारी परिषद के लगभग सभी सदस्य सादाते नोमहला यानी नोमहला के सय्यदों के यहाँ आया करते थे,अंग्रेजों के ख़िलाफ़ जो भी योजनाए तैयार की जाती,जलसे होते या अन्य क्रांतिकारी प्रोग्राम अधिकतर जुमे की नमाज़ के बाद सबकी मौजूदगी में होते थे।1857 कि असफलता के बाद  अंग्रेजी सेनाओं ने सबसे पहले नोमहला को अपने हिंसा का निशाना बनाया यहाँ बड़ी तादात में लोग शहीदे हुऐ बहुत बड़े पैमाने पर खून बहा ,एक एक घर वीरान हो गया था| 

स्वतंत्रता दिवस स्पेशल :  नोमहला कभी था आजादी के दीवानों का घर ,जानिए कब और कैसे बसा  नोमहला

अंग्रेजो से डरकर महिलाओं ने दी अपने जीवन की आहुति

सय्यद इस्माईल शाह अज़ान देते हुए शहीद हुए थे,ऐसे अराजकता के वातावरण में सय्यद परिवारों की लगभग 70 से 80 महिलाओं ने अपनी स्वाभिमान की रक्षा के लिए मस्जिद के कुएं में कूदकर जान दे दी थी आज भी उनकी कब्रे नोमहला कबस्तान में मौजूद हैं|  इन परिवारों के केवल चंद लोग ही बच सके और वे बहुत दिनों तक जंगल में रहे,ब्रिटिश हुकूमत के इस कहर के ख़ौफ़ और तरह तरह की कहानियों के चलते 1857 के बहुत बाद तक लोग इस इलाके से गुजरने की हिम्मत नही जुटा पाते थे| 

1906 में नोमहला  फिर आया अस्तित्व में 

सन 1906 में जाकर यह इलाका फिर से आबाद हुआ,आज भी क्रांतिकारियों के गुरुओं की मज़ार बरेली के सिविल लाइन स्थित नोमहला में मौजूद हैं, सय्यद अहमद शाह शाह जी बाबा,उनके बेटे सय्यद मासूम शाह की मज़ार हैं।दरगाह नासिर मियाँ के ख़ादिम सूफ़ी शाने अली कमाल मियाँ साबरी नासरी ने बताया कि खानदानी शजरा सय्यद नासिर तिमीज़ी के जरिये शहदाने कर्बला इमाम हुसैन से मिलता हैं,1906 में हज़रत नासिर मियां की दरगाह बनी तभी से नोमहला आज तक आबाद हैं और 1857 के क्रांतिकारियो की याद दिलाता हैं।

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Author: cradmin

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