बरेली कॉलेज केस में ऐतिहासिक फैसला: राज्यपाल ने प्राचार्य के पक्ष में सुनाया निर्णय, प्रबंधन की मनमानी पर लगी रोक

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बरेली।

उच्च शिक्षा संस्थानों में प्राचार्यों की स्वायत्तता और अधिकारों को लेकर लंबे समय से चल रही बहस के बीच बरेली कॉलेज से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सामने आया है। राज्यपाल एवं कुलाधिपति ने स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग से चयनित किसी प्राचार्य की परिवीक्षा अवधि बढ़ाने का अधिकार कॉलेज प्रबंधन समिति के पास नहीं है। इस आदेश के साथ बरेली कॉलेज के प्राचार्य प्रो. ओ.पी. राय के मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा पहले लिए गए निर्णय पर भी अंतिम मुहर लग गई है।

 

मामला बरेली कॉलेज के प्राचार्य प्रो. ओ.पी. राय से जुड़ा है। कॉलेज प्रबंधन समिति ने उनकी परिवीक्षा अवधि एक वर्ष बढ़ाने का निर्णय लिया था। इस फैसले को विश्वविद्यालय प्रशासन ने नियमों के विरुद्ध बताते हुए वर्ष 2023 में निरस्त कर दिया था। अब राज्यपाल एवं कुलाधिपति ने भी विश्वविद्यालय के निर्णय को सही ठहराते हुए प्रबंधन समिति की कार्रवाई को अवैध माना है।

इस फैसले को प्रदेशभर के आयोग से चयनित प्राचार्यों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि हाल के वर्षों में कई कॉलेजों में प्राचार्यों और प्रबंधन समितियों के बीच अधिकारों को लेकर विवाद सामने आए हैं। आरोप यह भी रहे हैं कि कई संस्थानों में स्वतंत्र रूप से काम करने वाले प्राचार्यों पर अनावश्यक दबाव बनाया जाता है।

 

जानकारी के मुताबिक प्रदेश में आयोग के माध्यम से नियुक्त किए गए कई प्राचार्यों ने विभिन्न कारणों और प्रबंधन के साथ विवादों के चलते अपने पदों से इस्तीफा तक दिया है। ऐसे माहौल में राज्यपाल का यह आदेश उच्च शिक्षा व्यवस्था में नियम आधारित प्रशासन को मजबूती देने वाला माना जा रहा है।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.पी. सिंह ने कहा कि विश्वविद्यालय हमेशा शैक्षणिक स्वायत्तता, नियमों के पालन और प्राचार्यों की गरिमा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहा है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत करेगा।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल बरेली कॉलेज तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बनेगा। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि किसी भी प्रबंधन समिति को नियमों से परे जाकर प्राचार्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। छात्रहित, शैक्षणिक गुणवत्ता और संस्थागत स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए ऐसे निर्णय बेहद महत्वपूर्ण हैं।

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Author: newsvoxindia

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