बरेली।जिला अस्पताल में दिल्ली क्राइम ब्रांच की दस्तक के बाद अब जांच सिर्फ एक कंप्यूटर ऑपरेटर तक सीमित नजर नहीं आ रही है। टीम को जिला अस्पताल में डेरा डाले तीसरा दिन होने वाला है और रिकॉर्ड से लेकर प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया तक हर कड़ी खंगाली जा रही है। उधर विकलांग कार्यालय से लेकर सीएमओ कार्यालय तक सन्नाटा पसरा है। कर्मचारियों के बीच एक ही सवाल है—जांच की आंच अब किस तक पहुंचेगी?

मामला फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र से जुड़ा है। जांच का अहम सवाल यह है कि प्रमाणपत्र तैयार करने वाला कंप्यूटर ऑपरेटर कुलदीप गंगवार आखिर अकेले इतनी पूरी प्रक्रिया कैसे कर सकता था? प्रमाणपत्र बनाने और जारी करने के बीच कई औपचारिकताएं पूरी होती हैं। दस्तावेजों की जांच, रिकॉर्ड में एंट्री और संबंधित स्तर पर हस्ताक्षर जैसी प्रक्रियाएं भी होती हैं। ऐसे में क्राइम ब्रांच यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी प्रमाणपत्र तैयार कराने और जारी कराने की प्रक्रिया में कुलदीप के अलावा और कौन-कौन लोग शामिल थे।
इसी बीच अस्पताल से जुड़े लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं। सुगबुगाहट है कि कुलदीप को अस्पताल के किसी बड़े आका की सिफारिश पर कंप्यूटर ऑपरेटर की जिम्मेदारी मिली थी। यह भी चर्चा है कि कुलदीप के पिता उस प्रभावशाली व्यक्ति के यहां खाना बनाने का काम करते हैं। हालांकि इन चर्चाओं की पुष्टि नहीं हुई है।
अब सबसे अहम कड़ी कुलदीप की पूछताछ मानी जा रही है। अगर उसने जांच टीम के सामने पूरी प्रक्रिया और अपने संपर्कों के बारे में जानकारी दी तो मामले में कई नए नाम सामने आ सकते हैं। फिलहाल क्राइम ब्रांच दस्तावेजों और रिकॉर्ड के जरिए कड़ी से कड़ी जोड़ने में जुटी है। जांच पूरी होने के बाद ही साफ होगा कि मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित था या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था।


