
बरेली | दरगाह आला हज़रत स्थित आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान फ़ाज़िले बरेलवी द्वारा स्थापित करदा मदरसा मंज़रे इस्लाम एक विश्वविख्यात शैक्षिक संस्था है। इसके शिक्षक मुफ्ती मो॰ सलीम नूरी, युवाओं को विशेष कर मदरसा और स्कूल छात्रों को मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों और हिन्दुस्तान को अंग्रेजों से आजादी दिलाने की तहरीकों में अहम भुमिका निभाने वाले मुस्लिम सिपाहियों और योध्द्वाओं के इतिहास से अवगत कराने और इन नौजवानों को देश के लिए बलिदान देने वालों की पूरी-पूरी जानकारी और ज्ञान देने तथा देश की उन्नति मे आपसी सौहार्द के महत्व को रेखांकित करने के लिए एक ई-पाठशाला का आयोजन कर रहे है। जिसका शीर्षक है ’’हिन्दुस्तान की आज़ादी और उन्नति में हिन्दु – मुस्लिम ऐकता की अहम भुमिका’
दरगाह के आई.टी सेल प्रभारी जुबैर रज़ा खान ने बताया कि दरगाह प्रमुख हज़रत अल्लामा अल्हाज मोहम्मद सुब्हान रजा खाँ सुब्हानी मियाँ और सज्जादा नशीन दरगाह आला हज़रत, हज़रत अल्लामा मुफ्ती मोहम्मद अहसन रजा कादरी की निगरानी में चलने वाले मदरसा मंजरे इस्लाम के वरिष्ठ टीचर मुफ्ती मोहम्मद सलीम नूरी युवाओं को मुस्लिम क्रांतिकारियों के इतिहास की भरपूर जानकारी देने के लिए लगातार पिछले माह से प्रयासरत हैं। ऑनलाइन कार्यक्रम मे मुफ्ती सलीम नूरी ने बताया कि रहमतुललाह सियानी तहरीके आजादी के एक ऐसे परवाने का नाम है कि जिस ने हिन्दु, मुस्लिम तथा सिख समुदाय के साथ मिलकर हिन्दुस्तान को पूर्ण स्वतन्त्रता दिलाने के लिए अपना सब कुछ कुरबान कर दिया। आजादी की तहरीक को परवान चढ़ाने के लिए इन्होंने अपने कैरियर, जायदाद और अपने घर-बार सब दांव पर लगा डाला।यह मुम्बई के ऐक काबिल वकील थे ।इन्होंने अपने कैरियर की परवाह किए बिना ही ग्रामीणो ।किसानो और गरीबो के हुकुक व अघिकारो की रक्षा के लिए अग्रेजी साम्राज्य से टकरा गये ।इस क्रान्तिकारी ने हिन्दु -मुस्लिम समुदाय मे सौहार्द की शमा रौशन की। ऐसे ही आज़ादी के मतवालों और देश प्रेमियों की वजह से आज हम इस मुल्क में आज़ादी की सांसें ले रहे हैं।
4 जून रहमतुललाह सियानी के देहान्त का दिन है यह भी तहरीक-ए-आज़ादी-ए-हिन्द के वह अज़ीम काइद और क्रांतिकारी हैं जिन्होंने हिन्दुस्तानियों के अन्दर आज़ादी का जज़्बा पैदा करने के लिए सब से एक लम्बी कानूनी जंग बहादुरी के साथ मिलकर लङी और ’’मुकम्मल आजादी’’ का अहवान किया । कई बार अंग्रेजों ने इन्हें जेल में डाला मगर यह आज़ादी की तहरीक से अलग न हुये। यह इन्डियन नेशनल काँग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों से भी वाबिस्ता रहे। आज़ादी का जज़्बा उभारने के लिए शोध लिखते, मज़मून लिखते और तकरीरें करते। आप हिन्दु-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। आप यह जानते थे कि जब तक सारे हिन्दुस्तानी एकजुट होकर आज़ादी की जंग ना लड़ेंगे तब तक यह मुल्क आज़ाद ना हो पायेगा।
मदरसा मंज़रे इस्लाम के मुफ्ती सलीम नूरी साहब के इस ऑनलाइन कार्यक्रम के माध्यम से हमारे युवा जंग ए आजादी में अहम भुमिका निभाने वाले और देश की आज़ादी के लिए अपनी जान-माल और इज़्ज़त व आबरू सब कुछ कुरबान और न्यौछावर कर देने वाले अल्लामा फज़ले हक़ खैराबादी, अल्लामा कैफी मुरादाबादी, मुफ्ती इनायत काकोरवी, आला हज़रत के दादा मुफ्ती रज़ा अली खाँ, आला हज़रत के वालिद मुफ्ती नक़ी अली खाँ, हाफिज रहमत खाँ, खान बहादुर खान, अशफाक उल्लाह खान, खान अब्दुल गफ्फार खान, बेगम हज़रत महल, नवाब सिराजुद्दौला, टीपू सुल्तान, मौलान हसरत मोहानी, मौलाना मोहम्मद अली जौहर जैसे देश प्रेमियों और क्रांतिकारियों के एतिहास को भरपूर तौर पर जानेंगे ।
मदरसा मंज़रे इस्लाम के आई.टी. सेल प्रभारी जुबैर रज़ा खां ने बताया कि इस पूरे ऑनलाइन प्रोग्राम को दरगाह की अधिकृत वेबसाईट पर भी अपलोड किया जा रहा है जिससे दूर-दराज के छात्र तथा युवा भी इस ऑनलाइन पाठ्यक्रम से लाभांबित हो सकें।




