
बरेली | आलाहज़रत के स्थापित कर्दा मदरसा मंज़रे इस्लाम दरगाहे आलाहज़रत के आई0 टी0 सेल के तत्वाधान में एक ऑनलाइन प्रोग्राम का आयोजन हुआ जिसका शीर्षक था- ‘‘खानकाही सूफी निज़ाम और मानवता की सेवा’’ दरगाहे प्रमुख हज़रत अल्लामा अल्हाज अश्शाह मो0 सुब्हान रज़ा खाँ ‘‘सुब्हानी मियाँ, सज्जादा नशीन हज़रत मुफ्ती अहसन मियाँ साहब और ज़िला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी जनाब जगमोहन सिंह जी की देख-रेख में आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में मुस्लिम नौजवानों और युवाओं को संबोधित करते हुए मदरसे के वरिष्ठ अध्यापक मुफ्ती सलीम नूरी ने कहा कि हमारा मुल्क अनेक धर्मों, भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृतियों और अनेकों रीतियों के मिश्रण का एक ऐसा देश है जिस में सदियों से सारे देशवासी ‘‘अनेकता में एकता’’ के असूलों पर कायम रहते हुए आपसी सौहार्द, भाईचारे के साथ रहते चले आ रहे हैं और यही बात इस देश को दूसरों देशों से ख़ास और मुमताज़ करती है।इस देश में जब तक मुस्लिम समुदाय पर ख़ानकाही सिस्टम, मज़ारों और पीर-वलियों तथा सूफिया ए किराम की शिक्षा का वर्चस्प रहा तब तक इस देश में आपसी सौहार्द भी रहा और बिना भेदभाव मानवता की खि़दमत करने का जज़्बा भी परवान चढ़ता रहा।हालाँकि कुछ दशकों से हिन्दुस्तान में कुछ ऐसे समूह पैदा हो गये हैं जो इस मुल्क में चले आ रहे इस आपसी सौहार्द को मिटाकर देशवासियों में नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं मगर आज भी इस मुल्क में मौजूद खानकाही सिस्टम से बंधे मुस्लिम मुसीबत के वक्त में बिना भेदभाव के मानवता की सेवा करके नफरत को पराजित करके इस देश में आपसी सौहार्द की मिसाल कायम करने का काम कर रहे हैं।

सारे देशवासियों को मानवता की सेवा करने वाले ऐसे भारतीय मुसलमानों को मुबारकबाद और सलामी देना चाहिए । हम उन तमाम भारतीय मुसलमानों को सलाम करते हैं कि जिन्होंने कोरोना काल में बिना भेदभाव के इंसानियत के नाते खि़दमत की और ज़रूरतमंदों की हर संभव मदद की।मदरसे के शिक्षक जनाब जुबैर रज़ा खान ने इस्लाम मुसलमान और मानवता की सेवा के टाॅपिक पर बोलते हुए कहा कि कोरोना वायरस अब पहले से ज़्यादा घातक है। इस कठिन दौर में बड़ी संख्या में मुस्लिम स्वयं सेवकों ने देखभाल और सहायता की पेशकश की। मुसलमान विशेष रूप से सलाम के लायक है क्यूँकि वह रमज़ान के महीने के दौरान खुद भूखे-प्यासे रहकर भी दूसरों की सेवा के लिए उपलब्ध थे। मुसलमान न केवल अपनी बिरादरी के लोगों की खिदमत कर रहे हैं बल्कि सभी समुदायों के ज़रुरतमंदों की भी सेवा कर रहे हैं।

मुसलमानों की इस गैर मामूली हिम्मत, हमदर्दी और कुर्बानी को आने वाले लम्बे समय तक याद रखना चाहिए। नागपुर के प्यारे खान का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है जिन्होंने विभिन्न अस्पतालों को आवश्यक ऑक्सीजन प्रदान करने के लिए लगभग 500000 रुपए खर्च किए। मथुरा, मुजफ्फरनगर, इंदौर, दिल्ली तथा अन्य जगहों पर भी मुसलमानों के बहुत से समूह दूसरों के जीवन की रक्षा के लिए 24 घंटे काम कर रहे हैं। कई जगह मुसलमानो ने अपनी मस्जिदों की नमाज़ पढ़ने वाली जगह के अतिरिक्त जो खारिजे मस्जिद जगह होती है उसको कोविड उपचार केंद्र में बदल दिया है, जिसमे सभी धर्मो के लोग उपचार ले सकें।इस्लाम विरोधी तथाकथित विद्वान जो अधिकतर सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं और यह सोचते हैं कि एक मुसलमान गैर मुस्लिम के लिए जो भी करता है वह या तो उसे परिवर्तित करने या तबाह करने के लिए करता है। ऐसी सोच वाले तथा वह कट्टर हिंदू जो मुसलमानो के लिए नफरत रखते है उन्हें आज मुसलमानो की इस सेवा-भाव से बहुत सबक और सीख लेना चाहिए।

आज यकीनन नफरत के सौदागर भी मायूस होंगे जिन्होंने एक लमबे समय से यह तबलीग की थी की किसी मुसलमान को गैर मुस्लिमो के साथ कोई एकता नहीं रखना चाहिए।मज़हबे इस्लाम पूरी तरह इंसानों की खिदमत के बारे में हमें दर्स देता है, चाहे वह इंसान किसी भी धर्म से जुड़ा हो। वह मुसलमान जो इस नज़रिए के पाबंद है वह इसके बेहतरीन खिदमतगार है।इस्लाम के अख़लाक और किरदार ने दुनिया पर अपना असर डाला और इस्लाम धर्म के पीर, वलियों, सूफियों और खानकाहों ने इस्लाम की इसी खूबी का प्रचार कर के दूसरे समुदायों के दिलों में अपने लिए जगह बनाई।




