बरेली। रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्यार और विश्वास का प्रतीक है। लेकिन बरेली में इस पर्व पर एक ऐसा रिश्ता सामने आया है, जिसकी शुरुआत न किसी पारिवारिक पहचान से हुई और न ही किसी पुराने रिश्ते से। एक बस में कंडक्टर और सवारी

यह कहानी है ज्योति, पत्नी सुमित श्रीवास्तव और रोडवेज कंडक्टर अमर पाल सिंह निवासी रामपुर की। करीब तीन साल पहले ज्योति बस से सफर कर रही थीं। इसी दौरान उनकी बातचीत कंडक्टर अमर पाल सिंह से हुई। बातचीत के दौरान ज्योति की नजर अमर पाल सिंह की सूनी कलाई पर पड़ी।
ज्योति ने उनसे पूछ लिया कि उनकी कोई बहन नहीं है क्या। अमर पाल सिंह ने बताया कि बहन तो है, लेकिन नौकरी की व्यस्तता और ड्यूटी के चलते कई बार वह रक्षाबंधन पर भी घर नहीं पहुंच पाते। यह बात ज्योति के दिल को छू गई।
ज्योति ने बिना देर किए अपने पर्स से राखी निकाली और उसी बस के सफर में अमर पाल सिंह को अपना मुंहबोला भाई बना लिया। एक सवारी और कंडक्टर के बीच शुरू हुआ यह रिश्ता उस दिन के साथ खत्म नहीं हुआ, बल्कि हर साल रक्षाबंधन पर और मजबूत होता चला गया।
इस रिश्ते की सबसे खास बात यह है कि दोनों के बीच पूरे साल लगातार बातचीत भी नहीं होती। साल में सिर्फ रक्षाबंधन के मौके पर एक बार भाई की कॉल आती है। फिर अमर पाल सिंह बरेली पहुंचते हैं, बहन ज्योति से राखी बंधवाते हैं और वापस अपनी ड्यूटी पर लौट जाते हैं।
इस बार भी तीन साल पुरानी परंपरा कायम रही। अमर पाल सिंह बरेली पहुंचे और ज्योति ने उनकी कलाई पर राखी बांधी। कुछ देर की इस मुलाकात में ऐसा अपनापन नजर आया, जैसे दोनों के बीच वर्षों पुराना पारिवारिक रिश्ता हो।
न खून का रिश्ता, न रोज की बातचीत और न बार-बार मुलाकात। फिर भी रक्षाबंधन के दिन होने वाली यह एक मुलाकात दोनों के रिश्ते को हर साल नया कर देती है।
कंडक्टर और सवारी के रूप में शुरू हुआ यह रिश्ता आज भाई-बहन के रिश्ते की खूबसूरत मिसाल बन चुका है। यह कहानी बताती है कि रिश्ते खून से ही नहीं बनते, बल्कि प्यार, सम्मान और सच्ची भावनाओं से भी बनते हैं।



