
बरेली | आलाहज़रत का स्थापित कर्दा मदरसा मंज़रे इस्लाम दरगाहे आलाहज़रत सौदागरान बरेली अपनी ई-पाठशाला द्वारा लगातार युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास और सच्चे देश प्रेमियों के देश के लिए दिये गये बलिदान की जानकारी देने का एतिहासिक तथा सराहनीय कार्य कर रहा है| दरगाह के मीडिया प्रभारी नासिर कुरैशी ने बताया कि जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी जनाब जगमोहन सिंह जी के तत्वाधान में मदरसा मंज़रे इस्लाम के वरिष्ठ शिक्षक मुफ़्ती मोहम्मद सलीम बरेलवी साहब ने मंजरे इस्लाम की ई-पाठशाला द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम मे स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा बरकतुल्लाह भोपाली के जन्मदिन 7 जुलाई पर उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आब्दुल हाफ़िज़ मोहम्मद बरकतुल्लाह जो बाद में मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली के नाम से मशहूर हुए इनका जन्म 7 जुलाई 1854 मे हुआ।इनके पिता एक आलिम थे जो बदायु युपी से भोपाल मे बस गये थे।भोपाल के सुलेमानिया स्कूल से अरबी, फ़ारसी की माध्यमिक और उच्च शिक्षा हासिल की। फिर यहीं से हाई स्कूल तक की अंग्रेज़ी शिक्षा भी हासिल की। पढ़ाई के दौरान ही उन्हें उच्च शिक्षित अनुभवी मौलवियों, विद्वानों से देश प्रेम की प्रेरणा मिली ।

पढ़ाई ख़त्म करने के बाद वह उसी स्कूल में अध्यापक हो गए. जब बरकतुल्लाह के माँ-बाप का इंतक़ाल हो गया तो वह भोपाल छोड़ कर मुम्बई चले गए. वहां पहले खंडाला और फिर बंबई में ट्यूशन पढ़ाकर अपनी अंग्रेज़ी की पढ़ाई जारी रखी।क़रीब चार साल बम्बई में रहे | 1887 में वो आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। वहां की चकाचौंध कर देने वाली ज़मीन पर पैर रखा तो वहां की दुनिया ने इन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया। वो लगातार सोचने लगे कि ‘सोने की चिड़िया’ कहलाने वाला मेरा देश हिन्दुस्तान गरीबी व पिछड़ापन का शिकार क्यों है।वह सोचते थे कि हिन्दुस्तान से लेकर यहां तक एक ही मल्का विक्टोरिया का राज है तो फिर हिन्दुस्तान की हालत इतनी ख़राब क्यों और यहां के हालात इतने अच्छे कैसे? काफी चिन्तन-मनन के बाद समझ आया कि यहां की खुशहाली हिन्दुस्तान की आर्थिक लूटमार पर निर्भर है।बस फिर क्या था यहीं से मौलाना ने अपने देश पर ढाए जा रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने की ठान ली. वह पहले अनोखे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जिन्होंने अपनी अदभुत कूटनीति से विश्वस्तर पर विशव शक्तियों से मिलकर भारत को आज़ाद कराने के लिए ब्रिटिश हुकूमत पर दवाब बनाने का आग्रह किया । उनके इन प्रयासों को देख ब्रिटिश साम्राज्य उनके प्राणों का दुश्मन हो गया ।
वतन की आजादी की चिंता उनहे जापान ले आई।यहां उन्होंने ‘अल-इस्लाम’ नाम का अख़बार निकाला, जिसमें वो आज़ादी हासिल करने के लिए जोशीले लेख लिखते थे और फिर उस अख़बार की कापियां भारत और विदेशों में बंटवाते थे | अब वो अंग्रेज़ों की आंखों में ओर जियादा खटकने लगे| अंग्रेज़ी सरकार ने जापान सरकार पर उन्हें बंदी बनाने या देश से निकालने का दबाव डाला तो वो जापान छोड़कर अमेरिका चले गए| यहां भी वह भारत को आज़ाद कराने की कोशिशों में लगे रहें।
1915 में तुर्की और जर्मन की सहायता से अफ़ग़ानिस्तान में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ चल रही ‘ग़दर लहर’ में भाग लेने के वास्ते मौलाना अमेरिका से क़ाबुल, अफ़ग़ानिस्तान पहुंचे. 1915 में उन्होंने अअपने मित्र राजा महेन्द्र प्रताप सिंह से मिलकर भारत की पहली अस्थायी सरकार का ऐलान कर दिया| राजा महेन्द्र प्रताप सिंह इसके पहले राष्ट्रपति तथा मौलाना बरकतुल्ला इसके पहले प्रधानमंत्री बने। अंतिम दिनों तक राजा महेन्द्र प्रताप हमेशा मौलाना के साथ रहे।वह हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर तथा आपसी सौहार्द के प्रतीक थे|
जून 1927 में मौलाना भोपाली ने अपने साथियों के बीच ये बात रखी कि एक बार फिर अमेरीका के दौरे पर चलना चाहिए और अपने पुराने साथियों से मिलकर भारत की आजादी के लिए कोई नया प्रोग्राम तय करना चाहिए| बस फिर क्या था मौलाना राजा महेन्द्र प्रताप के साथ जर्मन जहाज़ पर सवार होकर अमेरिका के लिए चल दिए ओर भारत की आजादी की लड़ाई लडते सनफिरासिसको मे बीमार पड गये ।
20 सितम्बर 1927 की रात मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली की आख़िरी रात थी. इस रात अपने साथियों से अपने पूरे होशों-हवास में उन्होंने कहा था —‘तमाम ज़िन्दगी मैं पुरी ईमानदारी के साथ अपने वतन की आज़ादी के लिए जद्दोजहद करता रहा. ये मेरी ख़ुश-क़िस्मती थी कि मेरी नाचीज़ ज़िन्दगी मेरे प्यारे वतन के काम आई. आज इस ज़िन्दगी से रुख़्सत होते हुए जहां मुझे ये अफ़सोस है कि मेरी ज़िन्दगी में मेरी कोशिश कामयाब नहीं हो सकी, वहीं मुझे इस बात का भी इत्मिनान है कि मेरे बाद मेरे मुल्क को आज़ाद कराने के लिए लाखों आदमी आज आगे बढ़ आए हैं, जो सच्चे हैं, बहादुर हैं और जांबाज़ हैं|
20 सितम्बर 1927 को आज़ादी ए हिन्द का सपना अपनी ऑंखों मे सजाये यह महान योद्धा हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा हो गया ।
प्रेस एसोसिएशन ऑफ़ अमेरिका ने इस ख़बर को पूरे युरोप और एशिया में फैला दिया. जहां-जहां हिन्दुस्तानियों को ये ख़बर पहुंची, उन्होंने मौलाना के गम में अपने कारोबार बंद कर दिए।
मंजरे इसलाम आई0टी0 सेल अध्यक्ष जुबैर रजा खान साहब ने बताया कि पांच दिन तक मौलाना को हिफ़ाज़त के साथ रखा गया ताकि उनके चाहने वाले उनका दीदार कर सकें फिर जनाजा Sacramento से Maryville पहुंचाया गया, और वहां के मुस्लिम क़ब्रिस्तान में ये कहकर दफ़न कर दिया गया कि हिन्दुस्तान के आज़ाद हो जाने पर तुम्हारी ख़ाक को हिन्दुस्तान पहुंचा दिया जाएगा।जुबैर रज़ा खान साहब ने कहा कि हमारे देश में नफरत फैला कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वालो को आज़ादी के इन सितारो के बलिदान से प्रेरणा लेकर देश में आपसी सौहार्द का वातावरण बनाने का प्रयास करते हुए देश को उन्नति के शिखर पर ले जाने की कोशिश करना चाहिए ।




