शमी वृक्ष को लेकर आस्था हुई और गहरी, महाभारत काल मे भी जिक्र

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भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में वृक्षों को केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि दिव्यता का प्रतीक माना गया है। इन्हीं पूजनीय वृक्षों में शमी का पेड़

(संस्कृत में शमी, अंग्रेज़ी में Prosopis cineraria) एक अत्यंत पवित्र स्थान रखता है। इसे विशेष रूप से विजयदशमी, नवरात्रि, और दुर्गा पूजा जैसे पर्वों पर पूजा जाता है।

धार्मिक महत्व:

  1. पांडवों की कथा से जुड़ा वृक्ष
    महाभारत के अनुसार, जब पांडव अज्ञातवास में थे, तब उन्होंने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष में छिपाए थे। विजयदशमी के दिन अर्जुन ने इसी वृक्ष से अपने शस्त्र निकालकर युद्ध की शुरुआत की थी और विजय प्राप्त की। इसीलिए शमी वृक्ष को विजय का प्रतीक माना जाता है।

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  1. शनि दोष से मुक्ति का उपाय
    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शमी वृक्ष शनि ग्रह से संबंधित है। मान्यता है कि इसकी पूजा करने से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढैया जैसे प्रभावों से राहत मिलती है।
  2. देवी-देवताओं का वास
    कुछ मान्यताओं में शमी वृक्ष को भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और भगवान शिव से जोड़ा गया है। इसकी पूजा से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है।

पर्यावरणीय लाभ:

  • शमी वृक्ष सूखे और रेगिस्तानी इलाकों में भी आसानी से पनपता है, जिससे यह भूमि कटाव रोकने में सहायक होता है।
  • इसकी जड़ें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं और वातावरण को शुद्ध करती हैं।
  • इसके फूल, पत्तियां और फल औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं।

विजयदशमी और शमी पूजा:

विजयदशमी के दिन शमी वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है। इसकी पत्तियों को “सोना” मानकर लोग एक-दूसरे को भेंट करते हैं। यह परंपरा आपसी प्रेम, समृद्धि और विजय का प्रतीक मानी जाती है।

शमी मंत्र:

“ॐ शमी शमयते पापं, शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी, रामस्य प्रियदर्शिनी॥”

इस मंत्र का जाप करते हुए शमी वृक्ष की पूजा करने से मानसिक शांति और सफलता की प्राप्ति होती है।

 

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Author: newsvoxindia

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