बरेली।
निर्धारित मार्गों से निकले ताजियों के साथ बड़ी संख्या में अकीदतमंद पैदल चलते रहे। श्रद्धालु हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करते हुए मातम कर रहे थे। पूरे रास्ते धार्मिक माहौल बना रहा और लोगों ने पूरी श्रद्धा के साथ जुलूस में भाग लिया।
शहर के विभिन्न मोहल्लों और अंजुमनों की ओर से तैयार किए गए ताजिए अपनी आकर्षक सजावट और पारंपरिक शैली के कारण लोगों का ध्यान खींचते रहे। सड़क किनारे बड़ी संख्या में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग ताजियों के दीदार के लिए मौजूद रहे। कई स्थानों पर सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों ने शर्बत और पानी की सबील लगाकर जुलूस में शामिल लोगों की सेवा की।
सुरक्षा व्यवस्था रही चाक-चौबंद
मोहर्रम को देखते हुए पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहा। जुलूस मार्गों पर पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया गया था। वरिष्ठ अधिकारी लगातार भ्रमण कर सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी करते रहे। संवेदनशील स्थानों पर विशेष नजर रखी गई और जरूरत के अनुसार यातायात को डायवर्ट कर आम लोगों को सुविधा प्रदान की गई। प्रशासन की निगरानी में सभी जुलूस शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुए।
क्या है मोहर्रम और ताजिए का महत्व?
मोहर्रम इस्लामी हिजरी कैलेंडर का पहला महीना है। इसकी 10वीं तारीख, जिसे यौमे आशूरा कहा जाता है, कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाती है जब हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने सत्य, इंसाफ और मानवता की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। उसी शहादत की याद में ताजियों के जुलूस निकाले जाते हैं। ताजिया इमाम हुसैन के रोजे का प्रतीक माना जाता है और यह त्याग, न्याय तथा अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का संदेश देता है।
मोहर्रम के अवसर पर बरेली में एक बार फिर धार्मिक आस्था, सामाजिक एकता और आपसी भाईचारे की मिसाल देखने को मिली। श्रद्धालुओं ने पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ कर्बला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश किया।




