केंद्रीय बजट 2026–27 पर बरेली में मिली-जुली प्रतिक्रिया, किसी ने बताया विकासोन्मुखी तो किसी ने कहा किसान-मजदूर विरोधी

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बरेली। संसद में प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026–27 को लेकर बरेली में अलग-अलग वर्गों और संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी, व्यापारी वर्ग और मुस्लिम समाज के एक बड़े हिस्से ने बजट को संतुलित और स्वागत योग्य बताया, वहीं कांग्रेस, किसान संगठनों और मजदूर प्रतिनिधियों ने इसे जनविरोधी और जमीनी समस्याओं से दूर करार दिया।

आल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी ने केंद्रीय बजट का स्वागत करते हुए कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए बजट में समाज के हर तबके का ध्यान रखा गया है। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों के हितों के लिए 3350 करोड़ रुपये का प्रावधान यह दर्शाता है कि सरकार ने अल्पसंख्यक समाज पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। यह राशि पिछले वर्ष की तुलना में 166 करोड़ रुपये अधिक है, जो सकारात्मक प्रयास को दर्शाती है।

मौलाना रज़वी ने कहा कि बजट में व्यापार, उद्योग, बाजार, नौकरी पेशा वर्ग, घरेलू क्षेत्र, युवा, खेल, शिक्षा और अल्पसंख्यक समाज के लिए अलग-अलग प्रावधान कर देश को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई है और इसमें प्रधानमंत्री के नारे “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” की झलक साफ दिखाई देती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए और अफसरशाही की लूट-खसोट पर सख्त नियंत्रण जरूरी है, ताकि योजनाएं वास्तव में अल्पसंख्यकों तक पहुंच सकें।

वहीं दूसरी ओर किसान सत्याग्रह स्थल पर कांग्रेस और किसान संगठनों ने बजट पर तीखा विरोध दर्ज कराया। कांग्रेस जिलाध्यक्ष असफाक सक्लेनी ने कहा कि यह बजट किसानों, मजदूरों, आदिवासी समाज और ग्रामीण भारत की मूल समस्याओं का समाधान करने में पूरी तरह असफल रहा है। कांग्रेस महानगर अध्यक्ष दिनेश दद्दा ने बढ़ती महंगाई, खेती की बढ़ती लागत, कर्ज में डूबे किसानों और आत्महत्याओं जैसे मुद्दों पर बजट में ठोस कदम न होने पर नाराजगी जताई।

किसान सत्याग्रह के संयोजक डॉ. हरीश गंगवार ने कहा कि बजट में न तो किसान कर्जमाफी और न ही कर्ज राहत का कोई स्पष्ट प्रावधान है। न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी देने की मांग पर सरकार मौन रही और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की राशि भी नहीं बढ़ाई गई। उन्होंने कहा कि ग्रामीण रोजगार, मनरेगा, न्यूनतम मजदूरी और मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा पर बजट बेहद निराशाजनक है। आदिवासी समाज के जल-जंगल-जमीन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को भी नजरअंदाज किया गया है।

प्रवक्ता पंडित राज शर्मा ने आरोप लगाया कि बजट का झुकाव शहरी-कॉरपोरेट हितों की ओर है और किसानों की तात्कालिक समस्याओं—कम दाम पर फसल बिक्री, कर्ज का बोझ और फसल नुकसान—का समाधान इसमें नहीं है। किसान नेताओं ने सरकार से MSP की कानूनी गारंटी, कर्ज राहत, आय सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार सृजन पर ठोस फैसलों की मांग की।

फोटो में सियासी मंच प्रमुख वसीम मियां

सियासी मंच के प्रमुख वसीम मियां ने बजट पर कहा कि यह बजट स्थिरता और संतुलन की बात तो करता है, लेकिन आम जनता को कोई तात्कालिक राहत देता नजर नहीं आता। सरकार का फोकस इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार सृजन पर है, जिसका असर यदि योजनाएं सही ढंग से लागू हुईं तो अगले 2–3 वर्षों में दिख सकता है।

लेकिन वर्तमान समय की बड़ी समस्याएं महंगाई, बेरोजगारी, महंगा स्वास्थ्य उपचार और आम लोगों के लिए सुलभ आवास—इस बजट में सीधे तौर पर संबोधित नहीं की गई हैं। न कर राहत है, न जीवनयापन की बढ़ती लागत पर ठोस नियंत्रण। कुल मिलाकर यह बजट भरोसे और धैर्य पर टिका हुआ है, जिसमें उम्मीदें ज्यादा हैं और तात्कालिक राहत बेहद कम है।

 

 

उधर उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार मंडल के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं बरेली मर्चेंट एसोसिएशन के संरक्षक जफर बेग ने बजट का समर्थन करते हुए कहा कि यह बजट व्यापारी वर्ग और समाज के हित में है और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने कहा कि यह बजट वैश्विक स्तर पर भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगा और चीन-अमेरिका की भारत विरोधी नीतियों का भी जवाब बनेगा।

अधिवक्ता वैभव माथुर बजट को लेकर कहा कि मोटर दुर्घटना क्लेम ट्रिब्यूनल से मिलने वाले मुआवजे के ब्याज पर अब कोई टैक्स नहीं लगेगा।यह बजट आम आदमी की जेब में सीधे ज्यादा पैसे नहीं डालता (क्योंकि टैक्स स्लैब वही हैं), लेकिन बीमार लोगों (कैंसर दवाएं सस्ती), विदेश पढ़ने जाने वाले छात्रों और विदेश घूमने जाने वालों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। सरकार का पूरा फोकस टैक्स प्रक्रिया को आसान बनाने और बेवजह की कागजी कार्रवाई को कम करने पर है।

 

इस बीच उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व सचिव एवं कोऑर्डिनेटर चौधरी असलम मियां ने बजट को “निराशाजनक, दिशाहीन और जनविरोधी” बताते हुए कहा कि यह सरकार जनता की नहीं बल्कि चुनिंदा पूंजीपतियों के हित में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि न युवाओं के लिए ठोस रोजगार योजना है, न किसानों की आय बढ़ाने की स्पष्ट नीति और न ही आम जनता को महंगाई से राहत।
कुल मिलाकर केंद्रीय बजट 2026–27 को लेकर बरेली में साफ तौर पर दो धाराएं नजर आईं—एक पक्ष ने इसे विकास, समावेश और भविष्य की तैयारी का बजट बताया, जबकि दूसरे पक्ष ने इसे किसानों, मजदूरों और ग्रामीण भारत की अनदेखी करने वाला बजट करार देते हुए इसके खिलाफ आवाज बुलंद की।

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Author: newsvoxindia

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