उत्तर प्रदेश के बरेली में मलूकपुर की ‘रावण वाली गली’ और किला क्षेत्र के फूटा दरवाजा की पहचान यहां के अनूठे कारीगरों से जुड़ी है। मलूकपुर में जहां दशहरे के लिए रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले तैयार किए जाते हैं, वहीं फूटा दरवाजा में भी एक मुस्लिम परिवार रावण के पुतले बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। इस परिवार की पहचान ‘कल्लू रावण वाले’ के नाम से रही है।

खास बात यह है कि दशहरे पर पुतले बनाने वाले ये कारीगर मोहर्रम के दौरान ताजियों को सजाने का काम भी करते हैं। करीब 200 साल पुरानी बताई जाने वाली इस कारीगरी को कई पीढ़ियां सहेजती आ रही हैं। हालांकि, बढ़ती महंगाई और घटते ऑर्डर ने इन परिवारों के सामने रोजी-रोटी की चुनौती भी खड़ी कर दी है। कभी 30 से 40 फीट ऊंचे रावण के पुतले बनाने वाले कारीगर अब 20 फीट के पुतलों के ज्यादा ऑर्डर मिलने की बात कह रहे हैं।
बरेली की रावण वाली गली क्यों है मशहूर?
बरेली के मलूकपुर स्थित रावण वाली गली की पहचान यहां बनने वाले रावण के पुतलों से जुड़ी है। दशहरा नजदीक आते ही यहां बांस, कागज और दूसरी सामग्री से रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले तैयार करने का काम तेज हो जाता है। पीढ़ियों से इस काम में लगे परिवार शहर के अलग-अलग रामलीला आयोजनों के लिए पुतले बनाते हैं।
इस गली की खासियत केवल पुतले बनाना नहीं, बल्कि उस पुश्तैनी हुनर को जिंदा रखना भी है, जिसे परिवारों ने अपने बुजुर्गों से सीखा है। त्योहारों के दौरान यहां कारीगरों की व्यस्तता बढ़ जाती है। पुतलों का ढांचा तैयार करने से लेकर उन्हें अंतिम रूप देने तक कई दिन की मेहनत लगती है।
करीब 200 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा ने रावण वाली गली को बरेली में अलग पहचान दी है। यहां की कारीगरी और इससे जुड़ी परंपरा लोगों की दिलचस्पी का विषय बनी रहती है।
फूटा दरवाजा में भी बनते हैं रावण के पुतले
बरेली के किला क्षेत्र स्थित फूटा दरवाजा में भी रावण के पुतले बनाने वाले परिवार की अपनी पहचान है। यहां कल्लू भाई को ‘कल्लू रावण वाले’ के नाम से जाना जाता था। उनके निधन के बाद उनके बेटे शादाब अली, शहंशाह भाई, शबाब अली और परिवार के दूसरे सदस्य इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं।
इस परिवार की खासियत है कि दशहरे पर रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले बनाने के साथ मोहर्रम के दौरान ताजियों को सजाने का काम भी किया जाता है। इस तरह परिवार का पुश्तैनी हुनर अलग-अलग त्योहारों से जुड़ा हुआ है।
परिवार के मुताबिक, पहले करीब 20 युवक पुतले बनाने के काम में लगे रहते थे, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर लगभग 10 रह गई है। काम कम होने और लागत बढ़ने के बावजूद परिवार ने अपनी कला को नहीं छोड़ा है।

ससुर से सीखा पुतले बनाने का हुनर
मलूकपुर की रावण वाली गली में रहने वाले वीरेंद्र कुमार चंद्रा भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने अपने ससुर विश्वनाथ ठाकुर से पुतले बनाने की कला सीखी थी। वीरेंद्र के मुताबिक, उनके ससुर रावण के पुतले बनाते थे और उस समय कल्लू भाई भी उनके साथ काम करते थे। बाद में वीरेंद्र ने भी परिवार के साथ इस काम को जारी रखा।
वीरेंद्र बताते हैं कि उनके ससुराल पक्ष में करीब 200 साल से कई पीढ़ियां पुतले बनाने के काम से जुड़ी रही हैं। सावन से ही दशहरे की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। इस बार उनके परिवार को करीब 12 से 14 पुतले बनाने के ऑर्डर मिले हैं। फरीदपुर, पवन विहार और आलमगिरीगंज समेत कई स्थानों पर इन पुतलों को पहुंचाया जाना है।पुतले बनाने में बांस का ढांचा तैयार करने, कागज लगाने और सजावट करने में कई दिन लग जाते हैं। परिवार के सदस्य मिलकर काम करते हैं, ताकि समय पर ऑर्डर पूरे किए जा सकें।
महंगाई ने छोटा कर दिया रावण का कद
महंगाई का असर अब रावण के पुतलों की ऊंचाई पर भी दिखाई देने लगा है। वीरेंद्र कुमार के मुताबिक, पहले 30 से 40 फीट ऊंचे पुतले बनाने के ऑर्डर मिलते थे, लेकिन अब 20 फीट के पुतलों की मांग ज्यादा है। बांस और दूसरी जरूरी सामग्री की कीमत बढ़ने से पुतले बनाने की लागत भी लगातार बढ़ रही है।
कारीगरों के अनुसार, बांस का एक बंडल पहले करीब 250 रुपये में मिल जाता था, जबकि अब इसकी कीमत लगभग 450 रुपये हो गई है। एक पुतला तैयार करने में तीन मजदूरों को चार से पांच दिन तक काम करना पड़ता है। एक मजदूर की रोजाना मजदूरी करीब 800 रुपये है।
सामग्री और मजदूरी मिलाकर एक पुतला तैयार करने में लगभग 10 से 11 हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। लागत बढ़ने के बावजूद पहले की तरह ऑर्डर नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में कारीगरों के लिए मेहनत के हिसाब से पर्याप्त कमाई करना मुश्किल होता जा रहा है।
दशहरे के बाद दूसरे काम से चलाना पड़ता है परिवार
रावण के पुतले बनाने का काम मौसमी है। दशहरे से पहले कारीगरों को काम मिलता है, लेकिन त्योहार खत्म होने के बाद रोजगार की समस्या सामने आने लगती है।
वीरेंद्र कुमार अपने बेटे के साथ ई-रिक्शा चलाकर परिवार का खर्च चलाते हैं। वहीं, दूसरे परिवारों के सदस्य शादी समारोहों में सजावट और अन्य काम करते हैं।
दशहरे के दौरान पुतले बनाने के अलावा उन्हें रामलीला मैदानों तक पहुंचाने और खड़ा करने की जिम्मेदारी भी कई बार कारीगरों को निभानी पड़ती है। कुछ मौकों पर वे आतिशबाजी की व्यवस्था में भी सहयोग करते हैं। त्योहार का समय इन परिवारों के लिए कमाई का अहम अवसर होता है, इसलिए ऑर्डर समय पर पूरे करने के लिए दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है।
साझा संस्कृति की पहचान बनीं बरेली की ये जगहें
मलूकपुर की रावण वाली गली और फूटा दरवाजा के कारीगरों की कहानी केवल पुतले बनाने तक सीमित नहीं है। यह पीढ़ियों से चली आ रही उस कला की कहानी है, जिसमें अलग-अलग त्योहारों के लिए हुनर का इस्तेमाल किया जाता है।
एक ओर दशहरे के लिए रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले तैयार किए जाते हैं, तो दूसरी ओर मोहर्रम के दौरान ताजियों को सजाने का काम भी किया जाता है। इन परिवारों की कारीगरी बरेली की साझा सांस्कृतिक विरासत की झलक पेश करती है।



