महाभारत से जुड़ी रहस्यमयी धरती है बरेली! यहां द्रौपदी ने की थी शिव पूजा, आज भी अश्वत्थामा के भटकने की कहानी जिंदा

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सोर्स। अरविंद पेंटर, मुनीब जैदी

वरिष्ठ पत्रकार 

यूपी का बरेली जिला केवल झुमका नगरी या नाथ नगरी के नाम से ही नहीं जाना जाता, बल्कि इसका इतिहास महाभारत काल और प्राचीन भारत की कई रहस्यमयी कथाओं से भी जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि बरेली और इसके आसपास का इलाका इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और धार्मिक आस्था रखने वाले लोगों के लिए हमेशा आकर्षण का केंद्र बना रहता है।

फोटो । रामनगर में मिले अवशेष

इतिहासकारों के अनुसार बरेली का आंवला और रामनगर क्षेत्र कभी प्राचीन पंचाल राज्य का हिस्सा था। मान्यता है कि यहां राजा द्रुपद का शासन था, जिनकी पुत्री द्रौपदी थीं। द्रौपदी को पांचाली भी कहा जाता था, क्योंकि वह पंचाल राज्य की राजकुमारी थीं। कहा जाता है कि इसी क्षेत्र में उन्होंने भगवान शिव की आराधना की थी।

रामनगर को लेकर कई रोचक कथाएं आज भी लोगों के बीच प्रचलित हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां महाभारत काल के वीर भीम से जुड़ी निशानियां मौजूद हैं। गांवों में आज भी भीम की गदा और उनके पराक्रम की कहानियां सुनाई जाती हैं। इलाके में मौजूद पुराने टीले और अवशेष लोगों की उत्सुकता बढ़ाते हैं, हालांकि इनके बारे में अभी तक पूरी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो सकी है।

 

रामनगर अवशेष जो गवाही देते है महाभारत काल की

इस क्षेत्र से जुड़ी सबसे रहस्यमयी कहानी अश्वत्थामा की मानी जाती है। कई लोग दावा करते हैं कि सुबह के समय उन्हें यहां अश्वत्थामा के दर्शन हुए हैं। मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण ने उन्हें अमर होकर भटकने का श्राप दिया था।
आज का बरेली नाथ नगरी के नाम से प्रसिद्ध है। शहर की चारों दिशाओं में भगवान शिव के प्राचीन मंदिर मौजूद हैं। इनमें जोगी नवादा स्थित Vankhandi Nath Temple का विशेष महत्व माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार इस मंदिर में द्रौपदी ने शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की थी। मंदिर परिसर में आज भी साधु-संतों की समाधियां और पुराने अवशेष दिखाई देते हैं, जो इसकी प्राचीनता की गवाही देते हैं।

राम नगर की ऐतिहासिक विरासत की गवाह यह मूर्तियां

 

मंदिर को लेकर एक और दिलचस्प कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि मुगल काल में इसे तोड़ने की कोशिश की गई थी, लेकिन शिवलिंग को हाथियों से भी हिलाया नहीं जा सका। लोगों की आस्था है कि भगवान शिव की शक्ति ने मंदिर की रक्षा की।
इतिहासकारों का कहना है कि अहिच्छत्र का उल्लेख ऋग्वेद और कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। वहीं प्रसिद्ध चीनी यात्री Xuanzang ने भी अपने यात्रा विवरण में इस क्षेत्र का जिक्र किया था। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यहां कभी जैन धर्म का भी प्रभाव रहा, जिससे यह इलाका धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र बना।

इतिहासकार डॉ. अकील हुसैन जैदी के अनुसार, ‘अखबार-उस-सनादीद’ और ‘हयात-ए-हाफिज रहमत खां’ जैसी ऐतिहासिक पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि वर्ष 1940 के आसपास हुई पुरातात्विक खुदाई में प्राचीन काल के कई सिक्के प्राप्त हुए थे। इनमें अग्निमित्र और विश्वामित्र से संबंधित सिक्के भी शामिल हैं, जिनसे उस दौर की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति की जानकारी मिलती है।

इतिहासकार डॉ. अकील हुसैन जैदी

उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में पांचाल राज्य की राजधानी रहा, जिसे उस समय ‘अही क्षेत्र’ भी कहा जाता था। मान्यता है कि राजा द्रुपद (उचित) ने अपनी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर यहीं आयोजित किया था।
डॉ. जैदी के मुताबिक, महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य को जो जागीर दी गई थी, उसी के आधार पर ‘गुरु का गांव’ अस्तित्व में आया, जिसे आज ‘गुरुग्राम’ के नाम से जाना जाता है। बरेली क्षेत्र में भी ‘गुरु का गांव’ नाम से एक स्थान प्रचलित है।
उन्होंने आगे बताया कि लगभग 1500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व के बीच यह क्षेत्र हिमालय की तराई से लेकर चंबल घाटी तक विस्तृत था, जहां बौद्ध और आर्यन परंपराओं से जुड़े लोग निवास करते थे।

 

प्रोफेसर गिरिराज नंदन गुप्ता

इतिहास के प्रोफेसर गिरिराज नंदन गुप्ता बताते हैं कि अहिच्छत्र को लेकर लोगों के बीच कई भ्रांतियां प्रचलित हैं, विशेष रूप से इसे सीधे पांडवकालीन स्थल मानने को लेकर। उनके अनुसार, अहिच्छत्र का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, जिससे इसकी प्राचीनता और महत्व स्पष्ट होता है। वे यह भी बताते हैं कि रामनगर का किला पांडवकाल के दौरान और अधिक विकसित हुआ तथा यह प्राचीन पंचाल राज्य की एक प्रमुख राजधानी रहा।
प्रोफेसर गुप्ता के अनुसार, अहिच्छत्र का धार्मिक महत्व भी काफी बड़ा रहा है। मान्यता है कि गौतम बुद्ध ने यहां सात दिनों तक प्रवास किया था। इसके साथ ही, यह क्षेत्र प्राचीन समय से ही समृद्ध और वैभवशाली रहा, जहां के नागरिक खुशहाल जीवन व्यतीत करते थे।
वे आगे बताते हैं कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग (ह्वेनसांग) ने भी इस क्षेत्र की यात्रा की थी और अपने यात्रा-वृत्तांत में इसका उल्लेख किया है, जिससे इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता और भी प्रमाणित होती है।

आज भी बरेली का यह ऐतिहासिक और रहस्यमयी अतीत लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां की कथाएं, मंदिर और प्राचीन अवशेष इतिहास और आस्था का ऐसा संगम पेश करते हैं, जो लोगों को सदियों पुराने दौर की याद दिलाते हैं।

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Author: newsvoxindia

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