बरेली। भारत की साझा संस्कृति और आपसी सम्मान की मिसालें अक्सर लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं। बरेली में आयोजित 108वें उर्स-ए-रज़वी के दौरान भी ऐसा ही एक निर्णय चर्चा का विषय बना हुआ है। इस वर्ष उर्स में पहली बार सभी लंगरों में मांसाहारी भोजन के स्थान पर पूरी तरह शाकाहारी भोजन परोसा जा रहा है। इसे सामाजिक सौहार्द, धार्मिक सम्मान और गंगा-जमुनी तहजीब को मजबूत करने की सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा रहा है।

उर्स इंतजामिया के अनुसार, वर्ष 1921 से शुरू हुई इस परंपरा में पहली बार चिकन और मटन बिरयानी के स्थान पर मटर, पनीर और आलू की बिरयानी, दाल, रोटी तथा अन्य शाकाहारी व्यंजन देश-विदेश से आए जायरीनों और श्रद्धालुओं को परोसे जा रहे हैं। यह निर्णय सावन माह और कांवड़ यात्रा के दौरान धार्मिक भावनाओं के सम्मान को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
आयोजकों का कहना है कि उर्स केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच प्रेम, सम्मान और भाईचारे का प्रतीक भी है। उनका मानना है कि इस पहल से यह संदेश जाता है कि अलग-अलग आस्थाओं का सम्मान करते हुए भी सामाजिक समरसता को मजबूत किया जा सकता है। बड़ी संख्या में पहुंचे जायरीन और स्थानीय लोग भी इस बदलाव का स्वागत कर रहे हैं।

जिलाधिकारी अविनाश सिंह ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि दरगाह आला हजरत और उर्स इंतजामिया का यह निर्णय बरेली की गंगा-जमुनी तहजीब को और मजबूत करने वाला है। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन का लक्ष्य है कि उर्स में आने वाले सभी जायरीनों को बेहतर सुविधाएं मिलें और वे बरेली से सौहार्द, सम्मान और अच्छी व्यवस्थाओं की सकारात्मक छवि लेकर लौटें।
108वें उर्स-ए-रज़वी की यह पहल इस बात का उदाहरण बनकर सामने आई है कि भारत की विविधता, परस्पर सम्मान और साझा सांस्कृतिक विरासत आज भी समाज को जोड़ने की ताकत रखती है। यही भावना देश की सामाजिक एकता और भाईचारे की सबसे बड़ी पहचान है।



