फोटो सोर्स। एआई जनरेटिड
बरेली। राजनीति में सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव अब नेताओं की प्राथमिकता बन चुका है। बरेली में कई छोटे-बड़े नेता और स्वयंभू समाजसेवी आजकल जनता के बीच कम, लेकिन मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। हर कार्यक्रम, हर मुलाकात और हर बयान को रील बनाकर वायरल करने की होड़ मची हुई है। कई नेताओं ने तो इसके लिए अलग से स्टूडियो तक बना रखे हैं, जबकि कुछ मीडिया एक्सपर्ट और सोशल मीडिया टीम पर हर महीने लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं।
चर्चा इस बात की है कि क्या सिर्फ रील और वायरल वीडियो के दम पर चुनाव में टिकट मिल सकता है या जनता का समर्थन हासिल किया जा सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सोशल मीडिया नेता की पहचान जरूर बढ़ा सकता है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए जनता के बीच मजबूत पकड़, संगठन और लोगों के सुख-दुख में साथ खड़ा होना सबसे जरूरी होता है।

बरेली में ऐसे कई चेहरे हैं जो सोशल मीडिया पर खुद को बेहद सक्रिय दिखाते हैं, लेकिन क्षेत्र की समस्याओं, गरीबों की मदद या जनता के संघर्ष के समय नजर नहीं आते। इसके बावजूद उनकी प्रोफेशनल वीडियो और फोटो शूट लगातार सोशल मीडिया पर चलते रहते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि रील और वीडियो प्रचार का माध्यम हो सकते हैं, लेकिन जनता अब दिखावे और वास्तविक काम के बीच फर्क समझने लगी है। गांव और मोहल्लों में लोगों के बीच पहुंच, भरोसा और वर्षों का जनसंपर्क आज भी चुनावी राजनीति की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है।
आने वाले चुनावों में यह साफ होगा कि सोशल मीडिया की चमक ज्यादा असर दिखाती है या जमीन पर काम करने वाले नेताओं की सादगी और जनता से जुड़ाव।




