बरेली।भारत की आत्मा उसकी परंपराओं, सेवा-भाव और विश्वास में बसती है। इसी भारतीय सोच और संस्कार का जीवंत उदाहरण है बरेली का हकीम खुर्शीद मुराद खानदान, जो बीते 13 पीढ़ियों से चिकित्सा सेवा के माध्यम से मानवता की सेवा कर रहा है। प्राचीन हकीमी विद्या और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के संतुलन के साथ यह परिवार भारतीय चिकित्सा परंपरा की गरिमा को न केवल सहेज रहा है, बल्कि उसे नई पीढ़ी तक और वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ा रहा है।

इस गौरवशाली चिकित्सा परंपरा की नींव वर्ष 1901 में हकीम मुख्तार अहमद खान ने रखी थी। मूल रूप से अमरोहा से ताल्लुक रखने वाला यह परिवार सेठ दामोदर दास और नवाबी परिवार के आग्रह पर बरेली आकर बस गया। बरेली के कुतुबखाना क्षेत्र से शुरू हुआ उनका दवाखाना समय के साथ विश्वास का ऐसा केंद्र बना, जिसकी पहचान आज देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक फैल चुकी है।
हकीम खुर्शीद मुराद बताते हैं कि उनका परिवार मूल रूप से अरब से यूनान गया और वहां से 1565 ईस्वी में एक शाही परिवार के निमंत्रण पर भारत आया। तभी से यह खानदान भारत की मिट्टी से जुड़कर सेवा करता चला आ रहा है। वर्तमान समय में उनके परिवार के सदस्य 12 देशों में चिकित्सा और शोध के क्षेत्र में कार्यरत हैं।
हकीम खुर्शीद मुराद नाड़ी विज्ञान में विशेष दक्षता रखते हैं। उनका मानना है कि इलाज केवल दवाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मरीज की नब्ज, जीवनशैली और मानसिक स्थिति को समझकर किया जाना चाहिए। यही कारण है कि देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी मरीज उनके पास उपचार के लिए पहुंचते हैं। गांधी परिवार से लेकर आमजन तक, इस खानदान ने डॉक्टर और मरीज के रिश्ते को सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं रखा, बल्कि भरोसे, संवेदना और अपनत्व से जोड़े रखा है।
आज यह परिवार परंपरा और आधुनिक चिकित्सा का सशक्त उदाहरण बन चुका है।
परिवार के बड़े पुत्र डॉ. आतिफ मुराद अमेरिका से एमडी की उपाधि प्राप्त कर आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परिवार का नाम रोशन कर रहे हैं। वहीं छोटे पुत्र हकीम अमीद मुराद ने विदेश जाने के बजाय अपनी मिट्टी को चुना और बरेली में रहकर 13 पीढ़ियों पुरानी हकीमी परंपरा को पूरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। परिवार की बेटी फिरदौस मुराद वर्तमान में लंदन में रहकर इस चिकित्सा विरासत की पहचान को वैश्विक स्तर पर और मजबूत कर रही हैं।
हकीम खुर्शीद मुराद के अनुसार चिकित्सा उनके लिए कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि मानव सेवा ही जीवन का मूल उद्देश्य है।उनका कहना है कि भारत जैसा अपनापन, संवेदना और सेवा-भाव दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता। यह परिवार इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि जड़ें मजबूत हों, तो शाखाएं पूरी दुनिया में फैल सकती हैं। बरेली की मिट्टी से उपजी यह हकीमी विरासत आज भी उतनी ही जीवंत, भरोसेमंद और प्रेरणादायक है, जितनी वर्ष 1901 में थी।




