
बरेली।भाद्रपद पूर्णिमा तिथि गत रविवार से ही श्राद्ध पक्ष प्रारंभ हो गया। जिनके यहां पूर्णिमा का श्राद्ध होता है, उन लोगों ने पूर्णिमा तिथि पर ही अपने पूर्वजों को तर्पण किया और ब्राह्मण को भोजन कराकर के दान पुण्य किया। सुबह साढे पांच बजे पूर्णिमा तिथि लगने के बाद श्रद्धालु अपने दिवंगत प्रियजनों, जिनका निधन पूर्णिमा तिथि को हुआ है, उनका श्राद्ध घर ब्राह्मणो को बुलाकर किया। कुछ लोगों ने रामगंगा पर जाकर भी स्नान करने के बाद तर्पण किया।
यहां तक कि लोगों ने अस्थि विसर्जन भी किया। रामगंगा पर भारी संख्या में श्रद्धालु श्राद्ध पक्ष में आते हैं, और पितरों को तर्पण देकर और दान -पुण्य करके तृप्त करते हैं। जानकार बताते हैं कि, कनागत में अस्थि विसर्जन करने का भी बड़ा खासा महत्व है। तर्पण में जौ, चावल, काले तिल और कुश का प्रयोग किया जाता है ।ब्राह्मण को भोजन कराकर के वस्त्र दक्षिणा इत्यादि दी जाती है। ऐसा करने से पितृ तृप्त होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। पितरों के आशीर्वाद से ही यश, वैभव, उन्नति, समृद्धि आदि की प्राप्ति सरलता से हो जाती है।
-पितृ ऋण से मुक्त होने को करते हैं तर्पण
श्राद्ध मीमांसा के अनुसार इस मास की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्ष भर करते हैं। वे चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाजे पर पहुंच जाते हैं। वहां अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को आशीर्वाद देकर चले जाते हैं। इसलिए पितृ ऋण से मुक्त होने के लिए श्राद्ध काल में पितरों का तर्पण व पूजन किया जाता है। पितृ पक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के, तथा तीन पीढ़ियों के माता के पक्ष के पूर्वजों को तर्पण किया जाता है। पितृ पक्ष में शुभ कार्य वर्जित रहते हैँ।
-पितृ तृप्त होकर देते हैं आशीष
जो श्रद्धालु सत्य व श्रद्धा से श्राद्ध और तर्पण कर्म करते हैं उससे माता पिता, आचार्य व अन्य सभी दिवंगत सगे संबंधी तृप्त हो अपनी संतानों को खुशहाली का आशीष देते हैं। वेद पुराणानुसार यह श्राद्ध तर्पण हमारे पूर्वज, माता पिता, और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। पितरों के कल्याणार्थ इन श्राद्ध के दिनों में श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। पितरों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करके तिल जौ, चावल, मिश्रित जल से तर्पण करने से वे तृप्त होते हैं। श्राद्ध का समय दोपहर 12 से एक बजे तक है।




