इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के एवान-ए-फरहत और गुड मैरिज हॉल पर हुई बुलडोजर कार्रवाई पर स्टे लगा दिया। बीडीए को छह सप्ताह में मामले का निपटारा करने के निर्देश।

एवान-ए-फरहत व गुड मैरिज हॉल पर बुलडोजर कार्रवाई पर हाईकोर्ट की रोक

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बरेली में स्थित एवान-ए-फरहत

और गुड मैरिज हॉल पर हुई बुलडोजर कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ी राहत देते हुए अस्थायी रोक लगा दी है। बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) ने इन दोनों विवाह भवनों को अवैध निर्माण बताते हुए कार्रवाई की थी, जिसके खिलाफ मालिकों ने हाईकोर्ट का रुख किया था।

याचिकाकर्ता सरफराज़ वली एवं उनके परिवार ने कोर्ट में दलील दी कि बीडीए ने बिना उचित प्रक्रिया अपनाए भवन को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्व में किसी वैध आदेश की प्रति उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई। उनके अनुसार, परिसर की स्थिति पुराने निर्माण की है और वह नियमानुसार समाधान चाहते हैं।

बीडीए की ओर से अदालत में यह पक्ष रखा गया कि विवाह हाल बिना स्वीकृत नक्शे और अनुमति के संचालित किए जा रहे थे। प्राधिकरण के अधिवक्ता ने यह भी कहा कि 2011 में नोटिस जारी किए गए थे और कई अवसर दिए जाने के बावजूद मालिकों ने न तो जवाब दिया और न ही आवश्यक अनुमति ली।

अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद यह माना कि याचिकाकर्ताओं को वैधानिक उपाय अपनाने का मौका दिया जाना चाहिए। अदालत ने निर्देश दिया कि मालिक दो सप्ताह के भीतर नियमन और कंपाउंडिंग से संबंधित आवेदन बीडीए के समक्ष प्रस्तुत करें। कोर्ट ने बीडीए को आदेश दिया कि आवेदन मिलने पर उसे छह सप्ताह के भीतर नियमानुसार निपटाया जाए और तब तक संपत्ति पर यथास्थिति  बनाए रखी जाए।

इस बीच किसी भी प्रकार का आगे का ध्वस्तीकरण, निर्माण या बदलाव करने पर रोक रहेगी।बताया जा रहा है कि इन बारात घरों के स्वामियों को स्थानीय सामाजिक और राजनीतिक हलकों में प्रभावशाली माना जाता है और उनका नाम कुछ प्रमुख नेताओं से निकटता के रूप में सामने आता रहा है।अदालत के आदेश के बाद फिलहाल दोनों विवाह भवनों पर बुलडोजर कार्रवाई रुकी रहेगी और आगे की प्रक्रिया बीडीए द्वारा कानूनी प्रावधानों के अनुसार पूरी की जाएगी।

फोटो में अधिवक्ता वैभव माथुर

 

अधिवक्ता वैभव माथुर ने बताया कि बारात घर पर हुई ध्वस्तीकरण कार्रवाई के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिसंबर को निर्देश दिया था कि एक सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट जाएं। इसके बाद हम हाईकोर्ट पहुँचे, जहाँ हमारी सभी दलीलें सुनी गईं।

हमने अदालत को बताया कि बीडीए जिस 2011 के आदेश के आधार पर कार्रवाई कर रहा है, वह न तो हमें कभी दिखाया गया और न ही वह आदेश कोर्ट में प्रस्तुत किया गया। बीडीए के वकील के पास भी इस आदेश को लेकर कोई स्पष्ट जवाब नहीं था। इस पर हाईकोर्ट ने गंभीरता से संज्ञान लेते हुए फैसला सुनाया।

हाईकोर्ट ने हमें 15 दिन के भीतर कंपाउंडिंग की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है। जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक बीडीए किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं करेगा।

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Author: newsvoxindia

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