शाहजहांपुर।
कथा वाचक ने बताया कि माता कैकेयी के वरदान से प्रभु श्रीराम को वनवास मिलने की खबर जब भरत जी को अयोध्या में मिली तो वे गहरे दुख से व्याकुल हो उठे। उन्होंने स्वयं को दोषी मानते हुए तत्काल चित्रकूट की ओर प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर जब भरत जी का प्रभु श्रीराम से मिलन हुआ तो वह क्षण सम्पूर्ण रामायण का सबसे मार्मिक प्रसंग बन गया।
भरत जी प्रभु के चरणों में गिर पड़े और निवेदन किया – “भैया! अयोध्या आपके बिना सूनी है, लौट आइए, यह राज्य आपका है।” परंतु प्रभु श्रीराम ने पिताजी की आज्ञा और धर्म की मर्यादा को सर्वोपरि बताते हुए वनवास पूरा करने का संकल्प दोहराया।
जब श्रीराम लौटने को तैयार नहीं हुए तो भरत जी ने उनके पावन चरणपादुका मांगी। प्रभु ने खड़ाऊँ अर्पित कर दीं, जिन्हें भरत जी ने सिर पर धारण कर लिया और प्रण किया कि “मैं राज्य का संचालन केवल आपके नाम से करूँगा, परंतु सिंहासन पर विराजमान आपकी खड़ाऊँ ही होंगी।”
इसके बाद भरत जी नंदीग्राम लौटे और चौदह वर्षों तक तपस्वी जीवन जीते हुए श्रीराम की खड़ाऊँ को राजसिंहासन पर रखकर धर्म और न्यायपूर्वक अयोध्या का संचालन किया।
कथा वाचक ने कहा कि यह प्रसंग त्याग, भक्ति और भ्रातृ प्रेम का अनुपम उदाहरण है, जो हमें सिखाता है कि सत्ता नहीं, बल्कि धर्म और मर्यादा ही सर्वोपरि हैं।
कथा समापन पर पूरा मैदान “भरत-राम मिलन” के जयघोष से गूँज उठा। इस अवसर पर अखिल भारतीय श्री राम नाम जागरण मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित निर्मल शास्त्री, रजनीश दीक्षित, हरि शरण बाजपेई, दीपक शर्मा, श्री दत्त शुक्ला, ब्लॉक प्रमुख कांट नमित दीक्षित, ब्लॉक प्रमुख खुटार अजय गुप्ता, उमा सिंगल, नीरज बाजपेई, मनोज मिश्रा, गौरव त्रिपाठी, अखिलेश सिंह, विष्णु मिश्रा, राम प्रकाश गुप्ता सहित अन्य गणमान्य लोगों ने आरती पूजन कर भाग लिया।
