चतुर्मास बाद जागेंगे जगतपति, शुरू होंगे मांगलिक कार्य

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बरेली। कार्तिक शुक्ल पक्ष देवोत्थान एकादशी इस बार 14 नवंबर रविवार को है। एकादशी का मान इस दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन यानी सोमवार को सूर्योदय तक रहेगा। इस एकादशी के साथ ही चार महीनों से रुके हुए सभी मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाएंगे। इस दिन शालिग्राम और तुलसी का विवाह उत्सव भी मनाया जाता है। दरअसल 20 जुलाई देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु चार माह के लिए शयन मुद्रा मे चले गए थे।अब देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान निद्रा से जागृत होंगे। पौराणिक मान्यता के अनुसार यह चार महीने भगवान के विश्राम दिवस के होते हैं। भगवान की विश्राम दिवस में कोई भी मांगलिक कार्य वर्जित माना गया है। अब भगवान के निद्रा से जागने के साथ ही सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। रविवार 14 जुलाई से सभी मांगलिक कार्य गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा नवीन कार्य विवाह आदि शुभ आयोजन शुरू जाएंगे। देवोत्थान एकादशी अनबूझा  मुहूर्त माना जाता है इसमें वगैर बिचारे विवाह संपन्न किया सकता है।

 इस पर्व को स्वयं सिद्ध मुहूर्त भी कहते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस एकादशी को पूजा- पाठ, व्रत- उपवास करने से मोक्ष की प्राप्ति सुगमता से होती है। और भौतिक सुखों का उपभोग भी सहजता से प्राप्त होता है। बता दे, 15 नवंबर से 14 दिसंबर तक केवल 16 लगन ही विवाह के शुभ मुहूर्त है। लेकिन 16 दिसंबर से एक माह के लिए फिर मांगलिक कार्यों पर ब्रेक लग जाएगा। क्योंकि, इस महीने धनु राशि पर सूर्य देव आ जाते हैं। इसलिए यह माह खरमास के नाम से जाना जाता है। यह महीना विवाह आदि शुभ मंगल कार्यों के लिए  वर्जित माना गया है।  अतः 14 जनवरी मकर संक्रांति से ही विवाह प्रारंभ हो सकेंगे। 14 जनवरी से 20 फरवरी तक लगातार विवाह मुहूर्त रहेंगे। लेकिन, 20 फरवरी को फिर गुरु अस्त हो जाएंगे जिस कारण से विवाह पर फिर से ब्रेक लगेगा। आगे होली बाद ही विवाह के कार्य संपन्न हो पाएंगे। 

एकादशी पर पूजा और महत्व
 एकादशी पर भगवान विष्णु और तुलसी माता की पूजा करने से समृद्धि बढ़ती है। इस दिन भगवान विष्णु को शंख बजाकर जगाए। पंचामृत, गंगाजल आदि से स्नान कराकर उन्हें वस्त्र, आभूषण पहना कर तिलक आदि लगाएं। सिंघाड़ा, गन्ना, शकरकंदी, केला, खीर, इत्यादि का भोग लगाएं। संभव हो तो 56 प्रकार के भोग भी लगा सकते हैं। इस दिन भगवान विष्णु लक्ष्मी तुलसी की पूजा करने से अथाह ज्ञान की प्राप्ति होती है इसलिए इसे देव प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं।  भगवान के जागने के कारण इसे देवोत्थानी एकादशी के नाम से जाना जाता है। 

वैवाहिक मुहूर्त 

नवंबर 15, 19, 20, 21, 26, 28, 29, 30, 

दिसंबर 12, 16, 8, 19, 11, 12, 13, 14, 

जनवरी 15, 20, 23, 24, 27, 28, 29, 30,

फरवरी 5, 6, 9, 11, 12, 18, 19, 20,

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Author: cradmin

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