
रुहेला सरदार हाफिज रहमत खां रोहिला को जांबाज योद्धा के तौर पर जाना जाता है उन्होंने 1748 में रुहेलखंड में हुकुमत की बागडोर संभालने के बाद लगभग 27 साल शासन किया और अंग्रेजों से जंग लड़ते हुए 1774 में शहीद हो गए बाद में हाफिज रहमत खां को बरेली के बाकरगंज स्थित हुसैन बाग में सुपुर्द ए खाक किया गया | जानकारी के मुताबिक अफगानिस्तान के रोह पहाड़ी इलाके में 1704 में जन्मे रुहेला सरदार नवाब हाफ़िज़ रहमत ख़ाँ की आठवीं पीढ़ी आज भी किला बरेली में रह रही है उनका मकबरा हुसैन बाग में है । रुहेलखंड रुहेला सरदार की आठवीं पीढ़ी समय के वंशज नवाब आतिफ अली खां बताते हैं कि हाफिज रहमत खां के वालिद शाह आलम खां घोड़ों का कारोबार करते थे । उन्हीं की फौज के अली मोहम्मद खां घोड़ों के मोहम्मद कारोबार के ही सिलसिले में रामपुर , आंवला पीलीभीत , मुरादाबाद आदि इलाकों में आया जाया करते थे,देश में अंग्रेजों का शासन था ,इस दौरान उन्होंने रामपुर के एक टुकड़े पर कब्ज़ा कर अपनी हुकुमत बना ली और नवाब रामपुर बने । यह हुकूमत रुहेलखंड कहलाने लगी । कुछ समय बाद आसपास के शासकों ने हमले करने शुरू कर दिए तो इससे अली मोहम्मद के सामने समस्याएं खड़ी होने लगीं ।
इन परिस्थितियों में उलझे अली मोहम्मद जब काफी वक़्त तक अफगानिस्तान नहीं लौटे तो चिंतित शाह आलम ने अपने बेटे हाफिज रहमत खां को उन्हें ढूंढने भेजा| वहां हालात देखकर उन्होंने फौज के साथ आसपास के इलाकों को बढ़ा लिया । वह जब भी रुहेलखंड आते थे , अली मोहम्मद की हुकूमत के इलाके को बढ़ाकर चले जाते थे आंवला और बरेली भी इसका हिस्सा बन गए । दिल्ली में हमला कर अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को कैद कर लिया था रुहेलखंड के शासक अली मोहम्मद को भी गिरफ्तार कर अंग्रेज दिल्ली ले गए और वहां उन्हें लाल किले में बंद कर दिया । इस पर अफगानिस्तान से शाह आलम ने हाफिज रहमत खां की फौज के साथ दिल्ली भेजा|
हाफिज रहमत खा ने अली मोहम्मद को मुक्त्त कराया जिसके बाद अली मोहम्मद ने हाफिज रहमत खां को ही रुहेलखंड की सत्ता सौंप दी । हाफिज रहमत खां के बढ़ते वर्चस्व अवध के शासक चिंतित होने लगे । लखनऊ के नवाब आसिफुद्दौला और बेटे सुजाउद्दौरला से भी दूसरे शासकों से दुश्मनी बढ़ रही थी । अंग्रेजों ने सुजाउद्दौला पर हमले शुरू कर दिए । इसी दौरान हाफिज रहमत खां और सुजाउद्दौला के बीच संधि हुई कि अंग्रेजों के खिलाफ वे दोनों एक दूसरे का साथ देंगे ।
1774 में हाफिज रहमत खां और अंग्रेजों के बीच जंग शाहजहांपुर के मीरानपुर कटरा में लड़ी गई । उधर सुजाउद्दौला अंग्रेजों से मिल गया । इसी जंग में अंग्रेजी फौज का तोप का एक गोला हाफिज रहमत खां के सीने पर लगा और वह घोड़े पर बैठे बैठे शहीद हो गए । हाफिज रहमत खां को अंग्रेजों से कई जंग हुई । उनकी राजधानी पहले आंवला थी जो बाद में बरेली बनी , आखिर में पीलीभीत में राजधानी बनाई । हाफिज रहमत खां अली की कई यादगार अब भी मौजूद हैं पीलीभील की जामा मस्जिद और उसके पीछे गौरीशंकर मंदिर का बढ़ते गेट उन्होंने ही बनवाया था जिस पर आज भी उनका नाम दर्ज है । बरेली में एक बाजार उन्होंने अपने वजीर मानराय के नाम पर बसाया जो अब कटरा मानराय के नाम जाना जाता है । बिहारीपुर में अपनी बहन के नाम पर बीबी जी मस्जिद बनवाई । इसी के पीछे उनके वजीर मानराय ने मंदिर बनवाया । आंवला में अली मोहम्मद खां का मकबरा भी अब तक कायम है ।
प्रशासन ने हाफिज रहमत खां का किया कद छोटा
हाफिज रहमत ने देश की आजादी में महत्वपूर्व योगदान देने के बावजूद प्रशासन ने उनकी शहादत को भुला दिया | हाफिज रहमत के मकबरे की हालत यह है यहां ना तो लाइट और ना उनसे जुड़ी बातों की कोई जानकारी | लोग बताते है कि यहां पुरातत्व विभाग ने एक बोर्ड तो लगाया जिसमें बताया कि इस दरगाह के 100 मीटर के दायरे में निर्माण करना अपराध है | इससे ज्यादा कभी कुछ नहीं हुआ | एक स्थानीय शख्स ने बताया कि यहां सरकार ने कुछ निर्माण तो कराया था लेकिन देखरेख के अभाव में वह भी खंडर हो गया |










