बरेली में मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं के खिलाफ गरजे ट्रेड यूनियन नेता

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बरेली। बरेली ट्रेड यूनियंस फेडरेशन के 22 वर्ष पूरे होने के अवसर पर ‘नई श्रम संहिताएँ: मजदूर वर्ग पर हमला’ विषय पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन 18 जनवरी को रोटरी भवन में किया गया। गोष्ठी में केंद्र की मोदी सरकार द्वारा 21 नवंबर 2025 को लागू की गई चार नई श्रम संहिताओं के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज करते हुए मजदूर वर्ग के व्यापक संघर्ष का ऐलान किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता बीटीयूएफ के अध्यक्ष मुकेश सक्सेना ने की। गोष्ठी की शुरुआत प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच द्वारा प्रस्तुत संघर्षपूर्ण गीतों से हुई।

गोष्ठी की शुरुआत में बीटीयूएफ के महामंत्री संजीव मेहरोत्रा ने फेडरेशन के 22 वर्षों के इतिहास, बरेली शहर में मजदूरों और कर्मचारियों के मुद्दों पर किए गए आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और सामाजिक सरोकारों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि फेडरेशन ने अपनी स्थापना के बाद से ही मजदूरों और कर्मचारियों की व्यापक एकता बनाने का निरंतर प्रयास किया है। आज जब नई श्रम संहिताओं के जरिए मजदूरों के अधिकारों पर हमला किया जा रहा है, तब पहले से अधिक व्यापक एकजुटता की जरूरत है।

बीटीयूएफ के उपाध्यक्ष ध्यान चंद्र मौर्य ने मजदूर आंदोलनों और श्रम कानूनों के इतिहास पर चर्चा करते हुए कहा कि जब मजदूर वर्ग संगठित और राजनीतिक रूप से सजग रहा, तब उसके हित में कानून बने। अंग्रेजी शासन के दौर में भी सरकार को मजदूर हितों के कानून बनाने को मजबूर होना पड़ा था। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा मोदी सरकार पुराने श्रम कानूनों को खत्म कर नई श्रम संहिताएँ लागू करके मजदूरों को एक बार फिर गुलामी जैसे हालात में धकेलना चाहती है। इसका मुकाबला केवल मजदूर वर्ग की व्यापक एकता से ही संभव है।

गोष्ठी के मुख्य वक्ता आल इंडिया इंश्योरेंस इम्प्लाइज एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अमान उल्ला खान, जो बैंगलोर से आए थे, ने अपने विस्तृत संबोधन में चारों लेबर कोड्स की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि इन संहिताओं के लागू होने से संगठित और असंगठित क्षेत्र के कामगारों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। नई श्रम संहिताओं में यूनियन बनाने और हड़ताल करने के अधिकारों को लगभग समाप्त कर दिया गया है, काम के घंटे बढ़ाए गए हैं और न्यूनतम वेतन को कमजोर करने की कोशिश की गई है।

अमान उल्ला खान ने कहा कि जिस तरह किसानों ने लंबे संघर्ष के बाद काले कृषि कानूनों को वापस कराने में सफलता पाई, उसी तरह मजदूरों और कर्मचारियों को भी लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा। उन्होंने बताया कि देश के लगभग 50 करोड़ मेहनतकश 12 फरवरी को सड़कों पर उतरकर इन चार मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं का कड़ा विरोध करेंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को पूंजीपतियों पर वेल्थ टैक्स और इनहेरिटेंस टैक्स लगाकर आम जनता और मजदूरों को राहत देनी चाहिए।गोष्ठी में डॉ. अंचल अहेरी, गीता शांत, जितेंद्र मिश्रा, नवींद्र कुमार, सलीम अहमद, रजनीश तिवारी, राजेंद्र सिंह, हरि शंकर, केपी सिंह, अरविंद देव सेवक, कैलाश, टीडी भास्कर, मिशन पाल सिंह सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन बीटीयूएफ के उप महामंत्री ललित चौधरी ने किया।

कार्यक्रम में देव सिंह, डॉ. मुनीश गंगवार, चरण सिंह यादव, मोहित देवल, हिमांशु सिंह, पुष्पा गंगवार, दिशा, निशा, रुचिका वर्मा, मो. फैसल, एडवोकेट यशपाल सिंह, एडवोकेट ऋषिपाल सिंह, सुरेंद्र प्रजापति, डॉ. रजनीश गंगवार, जगपाल भाटी, हरचरण लाल गंगवार, रवि कुमार, संदीप सिंह, मनोज गुप्ता, भगवान दास, उपेश मौर्य, जमुना देवी, रीना कोरी, अर्चना कुमारी, राशिदा सूरी, सौरभ शर्मा, सर्वेश मौर्य, राहुल गौड़, राकेश कन्नौजिया, दीपक मेहरा, हरगोविंद मौर्य, सुनील गौतम सहित बड़ी संख्या में मजदूर, कर्मचारी और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।

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Author: newsvoxindia

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