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पत्रकार संजीव की मौत ने मीडियाकर्मियों को झकझौरा, हम समाज के लिए हमारे लिए कौन !

सौजन्य : सोशल मीडिया

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बरेली। पत्रकारिता के गिरते हुए स्तर पर तमाम चर्चाएं होती रहती है।इस मुद्दे पर सब अपने हिसाब से एक्सपर्ट हो जाते है तो ऐसे में कोई पत्रकारिता के गिरते हुए स्तर पर तो कोई गोदी मीडिया कहकर समाज में पत्रकारों पर व्यंग कस देते है । इन सब बातों के बीच पत्रकार अपने धर्म से पीछे नहीं हटता है , यही वजह है कि जब भी समाज को मीडिया जरूरत होती है तो बस मीडिया को आवाज दी जाती है कि कोई सुने ना सुने मीडिया के द्वारा ही उनकी समस्या का सुनेगा । आखिर सबकी आवाज् सुनने वाले मीडिया की कोई आवाज कोई सुनता है यह भी अपने आप में बड़ा सवाल है।

 

 

मीडिया संस्थान भी आर्थिक मंदी के दायरे में आ जाते है और असमय बंद हो जाते है। ऐसे में समाज के वुद्धिजीवि, उद्योगपति और देश की सरकारें कहा लुप्त हो जाती है जो थोड़ी  मदद करके संस्थानों को बचा सकती है। सरकार उद्योग धंधों को बचाने के लिए इंडस्ट्री से जुड़े प्रावधान लाकर बचाने का काम करती है पर मीडिया संस्थानों के लिए नहीं , हाल में कई क्षेत्रीय चैनल बंद हुए जिन्हें बचाया जा सकता था पर किसे चिंता थी इन्हें बचाने की । असर तो मीडियाकर्मियों पर पड़ता उनके परिवारों को पड़ता है। उनकी जमा पूंजी खत्म हो जाती है। आज हालात यह हैं कि समाज में सबसे ज्यादा कोई आशावान रहता है तो वह पत्रकार है। आज नहीं कल सही हो जाएगा। पर ऐसा होता नहीं है। हालांकि समाज में यह भी देखा जाता है कि पत्रकार अपने हक में लड़ने की जगह दूसरों की लड़ाई लड़ने में ज्यादा उत्सुक रहते है।

संजीव के आत्महत्या के इस मामले ने मीडिया से जुड़े लोगों ने शुरू किया मंथन

दिल्ली में यूट्यूब चैनल के पत्रकार संजीव ने आत्महत्या कर ली। इंडिया टीवी में रह चुके संजीव के मीडिया वेंचर विफल होने या अर्थ के अभाव में चलाने में अक्षम होने परआत्मघाती कदम उठाने की यह घटना अत्यंत चिंतनीय है। अभी तक सुनते थे किसान आत्महत्या। अब वही हाल मीडिया क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। परिस्थितियों से पत्रकार और उनके परिवार जूझ रहे हैं। कुछ लड़ रहे हैं कुछ हार मान रहे हैं। संस्थान बढ़ रहे हैं लेकिन हालात नहीं सुधर रहे। न्यू मीडिया ने एक संभावना दिखाई थी, इसकी और नए पुराने बहुत से पत्रकार आकर्षित हुए। लेकिन इसका अर्थ तंत्र बेहद कमजोर है जो संजीव जैसी मनस्थिति को जन्म दे रहा है। प्रभावी होने के बावजूद सरकारें इसको संबल देने का कोई प्रयास नहीं कर रही हैं। जबकि सभी दल और शासन प्रशासन इसकी ताकत के आगे नतमस्तक हैं। हमें अपने नए पुराने साथियों से संवाद कायम रखना होगा। कोई साथी यदि अवसाद में जाता दिखे तो उसे सामयिक संबल दें। संजीव का यूं चले जाना एक सवाल है सभी के लिए।

सोशल मीडिया को स्थानीय स्तर पर विज्ञापन मिले तो बेहतर

सोशल मीडिया के क्षेत्र में बड़ी बड़ी कंपनी आ चुकी है , जिनकी आमदनी लाखों करोड़ों में है। वही सरकार भी बड़े हिट्स पर प्रदेश स्तर पर विज्ञापन देने का काम कर रही है। यदि सरकार यूनिक हिट्स , व्यूज की संख्या को कम करके जिले स्तर पर विज्ञापन दे तो छोटे स्तर पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चलाने वालों को काफी फायदा होगा और समाज के प्रति और ज्यादा जिम्मेदारी के साथ अपने परिवार के लिए भी जिम्मेदारी को निभा सकेंगे।

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