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नवरात्र स्पेशल :सर्वपितृ अमावस्या ब्रह्म योग में, रहेगी अनंत पुण्य दायिनी:

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ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मिश्रा 

बरेली।हिन्दू धर्म में सर्व पितृ अमावस्या का विशेष महत्व है। इस साल यह अमावस्या 06 अक्तूबर को है। इस बार की अमावस्या में ब्रह्म योग बन रहा है। ज्योतिष के अनुसार ब्रह्म योग में की गई पूजा पाठ अनंत गुना फलदाई होती है। जो यश, वैभव, रिद्धि-सिद्धि समृद्धि मैं तीव्रता से वृद्धि कराती है। इसलिए इस बार की अमावस्या बेहद ही खास है।  धार्मिक दृष्टि से यह श्राद्ध का अंतिम दिन होता है। शास्त्रों में आश्विन माह कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मोक्षदायिनी अमावस्या और पितृ विसर्जनी अमावस्या कहा गया है। मान्यता के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि इस दिन मृत्यु लोक से आए हुए पितृजन वापस लौट जाते हैं। जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास से नमन कर अपने पितरों को विदा करता है उसके पितृ देव उसके घर-परिवार में खुशियां भर देते हैं। जिस घर के पितृ प्रसन्न होते हैं पुत्र प्राप्ति और मांगलिक कार्यक्रम उन्हीं घरों में होते हैं। शास्त्र के अनुसार अमावस्या तिथि मनुष्य की जन्मकुंडली में बने हुए पितृदोष-मातृदोष से मुक्ति दिलाने के साथ-साथ तर्पण, पिंडदान एवं श्राद्ध के लिए अक्षय फलदायी मानी गई है। शास्त्रों में इस तिथि को ‘सर्वपितृ श्राद्ध’ तिथि भी माना गया है।

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-सर्व पितृ अमावस्या मुहूर्त

अमावस्या तिथि शुरू: शाम 7:04 बजे  05 अक्तूबर  से

अमावस्या तिथि समाप्त: दोपहर 4 :34 बजे 06 अक्तूबर तक

-इस विधि से करें पितरों का तर्पण

पितृ अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर बिना साबुन लगाए स्नान करें और फिर साफ-सुथरे कपड़े पहनें। पितरों के तर्पण के निमित्त सात्विक पकवान बनाएं और उनका श्राद्ध करें। शाम के समय सरसों के तेल के चार दीपक जलाएं। इन्हें घर की चौखट पर रख दें। एक दीपक लें। एक लोटे में जल लें। अब अपने पितरों को याद करें और उनसे यह प्रार्थना करें कि पितृपक्ष समाप्त हो गया है इसलिए वह परिवार के सभी सदस्यों को आशीर्वाद देकर अपने लोक में वापस चले जाएं। यह करने के पश्चात् जल से भरा लोटा और दीपक को लेकर पीपल की पूजा करने जाएं। वहां भगवान विष्णु जी का स्मरण कर पेड़ के नीचे दीपक रखें जल चढ़ाते हुए पितरों के आशीर्वाद की कामना करें। पितृ विसर्जन विधि के दौरान किसी से भी बात ना करें।

-सर्व पितृ अमावस्या का महत्व

देवताओं के पितृगण ‘अग्निष्वात्त’ जो सोमपथ लोक मे निवास करते हैं। उनकी मानसी कन्या, ‘अच्छोदा’ नाम की एक नदी के रूप में अवस्थित हुई। एक बार अच्छोदा ने एक हज़ार वर्ष तक निर्बाध तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर दिव्यशक्ति परायण देवताओं के पितृगण ‘अग्निष्वात्त’ अच्छोदा को वरदान देने के लिए दिव्य सुदर्शन शरीर धारण कर आश्विन अमावस्या के दिन उपस्थित हुए। उन पितृगणों में ‘अमावसु’ नाम की एक अत्यंत सुंदर पितर की मनोहारी-छवि यौवन और तेज देखकर अच्छोदा कामातुर हो गयी और उनसे प्रणय निवेदन करने लगीं किन्तु अमावसु अच्छोदा की कामप्रार्थना को ठुकराकर अनिच्छा प्रकट की, इससे अच्छोदा अति लज्जित हुई और स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरी। अमावसु के ब्रह्मचर्य और धैर्य की सभी पितरों ने सराहना की एवं वरदान दिया कि यह अमावस्या की तिथि ‘अमावसु’ के नाम से जानी जाएगी। जो प्राणी किसी भी दिन श्राद्ध न कर पाए वह केवल अमावस्या के दिन श्राद्ध-तर्पण करके सभी बीते चौदह दिनों का पुण्य प्राप्त करते हुए अपने पितरों को तृप्त कर सकते हैं। तभी से प्रत्येक माह की अमावस्या तिथि को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है और यह तिथि ‘सर्वपितृ श्राद्ध’ के रूप में भी मनाई जाती है।

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