अनुज सक्सेना
बरेली। जब देश अंग्रेजी हुकूमत की बेड़ियों में जकड़ा था, उस दौर में बरेली के बमनपुरी क्षेत्र से आस्था और सांस्कृतिक एकता की एक ऐसी मशाल जली, जो आज तक प्रज्वलित है। वर्ष 1861 में शुरू हुई बमनपुरी की रामलीला न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह शहर की ऐतिहासिक विरासत और जन एकता का प्रतीक भी है। अंग्रेजों ने इसे रोकने की कोशिश की, लेकिन जन आस्था के आगे उनके प्रयास बेअसर साबित हुए।

ब्रिटिश शासनकाल में जब सामाजिक और राजनीतिक हलचल तेज थी, तब स्थानीय नागरिकों ने लोगों को एकजुट रखने और सांस्कृतिक चेतना जगाने के उद्देश्य से रामलीला का मंचन शुरू किया। धीरे-धीरे यह आयोजन जनभावनाओं से जुड़ गया और हर वर्ष भव्य रूप लेने लगा। भीड़ और उत्साह को देखते हुए अंग्रेजी प्रशासन ने इस पर अंकुश लगाने का प्रयास किया, लेकिन जनता की दृढ़ता के कारण यह परंपरा निरंतर चलती रही।

बमनपुरी की रामलीला की विशेषता यह है कि इसका आयोजन होली के अवसर पर होता है। फागुन माह में कई दिनों तक रामायण प्रसंगों का मंचन किया जाता है। सीता स्वयंवर, धनुष यज्ञ, राम-विवाह और अन्य लीलाएं श्रद्धालुओं को भावविभोर कर देती हैं। छोटी होली के दिन निकलने वाली भव्य राम बारात इस आयोजन का मुख्य आकर्षण होती है। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान की सजीव झांकियां, बैंड-बाजे और रंगों की बौछार के बीच पूरा शहर उत्सव में डूब जाता है।
आज 160 से अधिक वर्षों बाद भी यह परंपरा उसी उत्साह से निभाई जा रही है। स्थानीय रामलीला कमेटी और शहरवासी मिलकर आयोजन को सफल बनाते हैं। बरेली ही नहीं, आसपास के जिलों और दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग इस ऐतिहासिक रामलीला को देखने आते हैं।
बमनपुरी की रामलीला केवल एक धार्मिक मंचन नहीं, बल्कि यह उस अटूट आस्था का प्रतीक है जिसे अंग्रेजी हुकूमत भी नहीं रोक सकी, और जो आज भी बरेली की पहचान बनकर गौरव से आगे बढ़ रही है।


