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पांचाल प्रदेश की लीलोर झील के पास प्यास लगने पर जब पांडव हुए थे बेहोश !

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निर्भय सक्सेना,

बरेली। महाभारत काल में अहिच्छत्र स्थित लीलौर झील का उल्लेख आता है। उत्तर प्रदेश के बरेली में आंवला तहसील के रामनगर इलाके में है यह लीलोर झील। इस झील का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्त्व भी है। महाभारत की लड़ाई के बाद युधिष्ठिर ने इसी झील के पास खड़े होकर यक्ष के प्रश्न के उत्तर दिए थे ऐसा कहा जाता है।

जब पांडव अज्ञातवास में थे तो वह द्रोपदी के साथ पांचाल प्रदेश भी आए थे। द्रोपदी का नाम पांचाली इसी कारण पड़ा था। इसी पांचाल प्रदेश की लीलोर झील के पास प्यास लगने पर जब पांडव गए तो कहा जाता है कि लीलोर झील पर पानी पीने से पूर्व यहां के रक्षक रहे यक्ष ने कुछ प्रश्न पांडव से पूछे थे। इसके बाद ही सही उत्तर मिलने पर पानी पीने को कहा था। जिस पर कई पांडव भाई निरंतर बेहोश होते गए।बाद में जब वहां युधिष्ठिर आए और अपने भाइयों को बेहोश पाया। तो वह गुस्से में आकर ललकारने लगे कि किसने मेरे भाइयों का यह हाल किया है। तब यक्ष ने कहा कि मेने तुम्हारे भाईयो का यह हाल किया है। यक्ष ने युधिष्ठिर से भी पानी लेने से पूर्व वही प्रश्न किए। अंत में यक्ष के प्रश्न के सही उत्तर पांडव युधिष्ठिर ने इस प्रकार दिए थे।

*यक्ष का प्रश्न* 1 प्रश्न = अज्ञान क्या है ? युधिष्ठिर का उत्तर = आत्मज्ञान का अभाव अज्ञान है।
2 प्रश्न = दुःखों से मुक्त कौन है? युधिष्ठिर का उत्तर = जो कभी क्रोध नहीं करता।
3 प्रश्न = वह क्या है जो अस्तित्व में है और नहीं भी? युधिष्ठिर का उत्तर = माया।
4 प्रश्न = माया क्या है? युधिष्ठिर का उत्तर = नाम और रूपधारी नाशवान जगत । इसके बाद ही सभी बेहोश पांडवों को होश आया। और उन्होंने लीलोर झील के पानी से प्यास बुझाई थी। बरेली के अहिच्छत्र के बारे में इसे पांचाल प्रदेश भी कहा जाता है। इसी कारण द्रोपदी का नाम पांचाली भी पड़ा था। यहां पर भीम की गदा भी एक शिला के रूप में पड़ी हुई है।जिसे देखने को लोग जाते है।

बरेली के अभय बाबू ने भी यहां से प्राप्त कुछ अवशेष रुहेलखंड विश्व विद्यालय को सौंप दिए थे। अगर बरेली के आंवला को दिल्ली रोड से मीरगंज से सड़क मार्ग से जोड़ दिया जाए तो यहां पर्यटक की आवाजाही बढ़ सकती है। मीरगंज के गोराघाट पर पुल बनकर आंवला को जोड़ने की कवायद अभी धीमी गति से ही चल रही है । अहिच्छत्र पर विकिलीपिडीया से प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश के बरेली जिला के आँवला स्थित रेलवे स्टेशन से कोई 10 किलोमीटर उत्तर प्राचीन रामनगर में अहिच्छत्र काल के अवशेष आज भी खंडहर के रूप में वर्तमान पड़े देखे जा सकते हैं। इनमें से कोई तीन मील के त्रिकोणाकार घेरे में ईटों की किलेबंदी के भीतर बहुत से ऊँचे-ऊँचे टीले भी हैं। सबसे ऊँचा टीला 75 फुट का है। ब्रिटिश काल में अंग्रेज कर्निघम ने सबसे पहले वहां कुछ खुदाई कराई और बाद में अंग्रेज फ्यूरर ने उसका अनुसरण किया। वर्ष1940 – 44 में यहाँ चुने हुए स्थानों की खुदाई भी हुई जिसमें भूरी मिट्टी के ठीकरे मिले थे। महाभारतकाल का तो कोई प्रमाण यहाँ नहीं मिला पर शुंग, कुषाण और गुप्तकाल की अनेक मुद्राएँ, पत्थर और मिट्टी की मूर्तियाँ यहां मिलीं। बाद के काल के रहने के स्थान, सड़कें और मंदिरों के अवशेष भी मिले हैं।

महाभारत के अनुसार उत्तर पाँचाल की राजधानी अहिच्छत्र को कुरुओं ने वहाँ के राज से छीनकर द्रोण को दे दिया था। कहा जाता है, द्रोण ने द्रुपद को अपने शिष्यों की सहायता से हराकर प्रतिशेध लिया था और उसका आधा राज्य बाँट लिया था। अहिच्छत्र के पाँचाल जनपद का इतिहास ईसा.पूर्व छठी शताब्दी से मिलता है। तब यह 16 जनपदों में से एक था।यहां प्राप्त मुद्राओं और लेखों से ज्ञात होता है कि ईसा पूर्व पहली शताब्दी में मित्रवंश के राजाओं ने अहिच्छत्र में राज किया था। कुछ विद्वानों ने इस वंश को शुंग राजाओं का वंश सिद्ध करने का भी प्रयास किया। पर वास्तव में यह प्रांतीय शासक थे, जैसा इस वंश की लंबी, मुद्रांकिन नामों के आधार पर बनी, तालिका से प्रतीत होता है।

इसके बाद का इतिहास कम हीं मिलता है। गुप्त साम्राज्य में नि:संदेह यह एक किला ही था। चीनी यात्री हुआन सांग ने यहाँ पर दस बौद्ध विहार और नौ मंदिर देखे थे। 11 वीं शताब्दी में भी इसका राजनीतिक महत्त्व बताया जाता रहा। बरेली के अहिच्छत्र के विकास की आर्किलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ए एस आई) एवम उत्तर प्रदेश सरकार ने कई योजनाएं भी बनाईं पर अभी तक विभागीय ताल मेल से इस महाभारत कालीन पौराणिक स्थल के विकास की योजनाएं परवान नहीं चढ़ सकीं।

बरेली के आंवला स्थित अहिच्छत्र के विकास के लिए केंद्र की प्रधानमंत्री मोदी सरकार एवम प्रदेश की योगी सरकार को भी कई पत्र समय समय पर भेजे जा चुके हैं। आंवला से बीजेपी के विधायक एवं प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह ने विगत दिनों मुझे बताया कि प्रदेश के पर्यटन विभाग ने पर्यटन सर्किट के तहत अहिच्छत्र एवम रामनगर के जैन मंदिर क्षेत्र के विकास की योजना बनाई है। इसके विकास पर जल्द ही काम शुरू होगा।

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