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स्पेशल स्टोरी :अहिच्छत्र के राजा द्रुपद किला पर ध्यान नहीं दे रहा भारतीय पुरातत्व विभाग,

किले की जमीन को भी अपने खेत में मिलाने का कुछ किसानों पर आरोप

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निर्भय सक्सेना

बरेली। बरेली के आंवला के रामनगर में अहिच्छत्र का राजा द्रुपद का किला आर्कोलाजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया ( ए एस आई) के नियंत्रण में है। पर जमीनी हकीकत यह है की यह प्राचीन किला आज भी दुर्दशा का शिकार है। भारतीए पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ए एस आई) हो या पर्यटन विभाग, यहां के खंडहर की रक्षा के लिए कोई भी सरकारी विभाग जिम्मेदारी लेने की बजाय गेंद एक दूसरे के पाले में ही गेंद फेंक कर अपनी उदासीनता दिखा रहा है। अब हालत यह हो गए हैं कि अहिच्छत्र किले के पास खेती करने वाले कुछ पट्टेधारी किसान किले की जमीन को भी अपने खेत में ही मिलाने या बढ़ाने में भी परहेज नहीं कर रहे हैं ऐसा आरोप ए एस आई अधिकारी का है। आंवला के पांचाल के अहिच्छत्र किले का इतिहास महाभारत कालीन रहा है । पांचाल नरेश राजा द्रुपद की पुत्री द्रोपदी भी पांचाली के नाम से ही पहचानी जाती रही।

 

 

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्य नाथ सरकार प्रदेश में पर्यटन को काफी बढ़ावा दे रही है। बरेली जिला के आंवला का जैन मंदिर एवम महानगर नाथ नगरी को तो पर्यटन सर्किट में स्थान मिल गया। जिसके लिए नाथ कोरिडोर बनाने वाली योजना पर भी जिला प्रशासन कार्य की गति बढ़ाने में लगा हुआ है। पर आंवला के पांचाल के अहिच्छत्र किले का महाभारत कालीन इतिहास आज भी उपेक्षित ही है । काफी समय पूर्व यहां बरेली के ही अभय बाबू ने कुछ अवशेष जुटा कर छोटा सा संग्रहालय का रूप भी दिया था। उनकी मृत्यु के बाद उनके परिजनों ने पांचाल से जुटाए वह अवशेष रुहेलखंड विश्व विद्यालय को दे दिए थे।

 

 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में ही आंवला के पांचाल के अहिच्छत्र किले की देखरेख की जिम्मेदारी है जिसे उसकी मेरठ इकाई ही देखभाल करती है। महाभारत कालीन यह अहिच्छत्र किला आज भी उपेक्षा का शिकार है। साथ ही यहां जाने वाला मार्ग, एवम सार्वजनिक परिवहन का साधन भी बहुत ही कम एवम दयनीय दशा में है। अपने साधन से यहां आने वाले पर्यटक/ दर्शक को कोई कुछ बताने वाला भी कोई नही है।

 

 

खानपान तो छोड़िए पेयजल आपूर्ति भी न के बराबर ही है। इसी किले से कुछ ही दूरी पर ऐतिहासिक लीलोर झील भी है जिसका महाभारत काल में भी उल्लेख है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के मेरठ इकाई के अधिकारी विनोद रावत ने फोन पर बताया कि अहिच्छत्र किले में अंदर पाथ वे को बनाया जा रहा है जो अप्रैल 2024 तक पूरा होने की आशा है।

 

 

 

हमारा विभाग पक्का मार्ग नहीं बनाता है। किले के बाहर तो जिला प्रशासन को ही मार्ग बनाना होगा। विनोद रावत का कहना है कि किले के आस पास काफी पट्टे की जमीन पर आजकल किसान खेती कर रहे है। उनका आरोप है की डिमार्केशन के अभाव में किसान किले की जमीन को भी अपने खेत में निरंतर बढ़ाते जा रहे थे। अब विभाग अहिच्छत्र किले की भूमि का डिमार्केशंन भी करा रहा है। यही नहीं किले की आस पास की भूमि को अक्वायर करने को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के मुख्यालय ने प्रस्ताव भी तैयार कर राज्य सरकार को भेजा है। ताकि यहां पर्यटन की विस्तार से योजना बन सके।

 

 

 

उत्तर प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम के क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी ब्रज पाल सिंह का कहना है कि विभाग नाथ नगरी कोरिडोर पर काम कर रहा है। आंवला के जैन मंदिर के आस पास भी विकास कार्य हुए हैं । उन्होंने कहा अहिच्छत्र के किले की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग पर ही है। हां किले के आस पास के विकास के लिए पर्यटन विभाग की योजनाऐं पाईप लाईन में हैं। प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री एवम आंवला के बीजेपी के विधायक धर्मपाल सिंह ने एक संक्षिप्त भेट में पूछने पर मुझे (निर्भय सक्सेना) बताया की अहिच्छत्र किले को पर्यटन नक्शे पर लाने को वह प्रयासरत है। जल्द ही इसका लाभ जनता के सामने आएगा।

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