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मुस्लिम एजेंडा : मुसलमानों को आर्थिक आधार पर सरकारी नौकरियों में मिले आरक्षण

 

बरेली | उर्से आला हज़रत के पहले दिन ’’इस्लामिक रिसर्च सेन्टर’’ स्थित दरगाह आला हज़रत में ’’आल  इण्डिया तंज़ीम उलेमा-ए-इस्लाम’’ की राष्ट्र कार्यकारिणी की बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता तंज़ीम के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुफ्ती अशफाक़ हुसैन क़ादरी ने की, इस बैठक में देश के विभिन्न राज्यों से आये हुये उलेमा ने मुसलमानों के मसाइल पर विस्तार से चर्चा की और मुसलमानों, हुक़मतों, और विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के कामों का जायज़ा लेते हुए एक ’’मुस्लिम एजेण्डा’’ भी तैयार किया गया।
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तंज़ीम के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना शहाबुद्दीन रज़वी ने प्रेस काँफ्रेंस में ’’मुस्लिम एजेण्डा’’ ज़ारी करते हुये मुसलमानों को हिदायत की है कि  शिक्षा, बिज़नेस, और परिवार पर ध्यान दें और समाज में फैल रही बुराईयों पर रोकथाम करें, अन्यथा भविष्य में बड़े नुकसान उठाने पड़ेंगे। मौलाना ने केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को कड़े शब्दों में कहा केः देश की एकता और अखण्डता के लिये मुसलमान हर कुर्बानी देने के लिये तैयार है, मगर हिन्दु और मुस्लिम के दरमियान नफरत फैलाने वाली राजनीति बरदाश नहीं की जा सकती है, और मुसलमानों के साथ ना इंसाफी और ज़ुल्म व ज़ियात्ती को भी ज़्यादा दिन तक हम सहन नहीं कर सकते, सरकारों व राजनीतिक पार्टियों को इस पर गम्भीरता से काम करना होगा, और मुसलमानों के तई अपने आचरण में बदलाव लाना होगा।
मुस्लिम का़ैम को हिदायतें:

1. ग़त वर्षों के मुकाबले में 2020-2021 में मुसलमानों की शिक्षा दर कुछ हद तक बढ़ी है, अब ग़रीब से ग़रीब मुसलमान भी अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम मे पढ़ाने का ख्वाहिशमन्द होता है, मगर ये पेशरफत बहुत ज़्यादा इत्मिनान बक्श (संतुष्टि) नहीं है, इसलिये मज़ीद कोशिशे ज़ारी रखी जाये।
2. मालदार मुसलमान ग़रीब और कमज़ोरों के बच्चों की स्कूल की फीस का खर्चा उठायें, ताकि ग़रीब बच्चे पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खडे़ हो सके।
3. मदरसों और मस्जिदों में चलने वाले दीनी मक़तबों में अरबी, उर्दू के साथ-साथ हिन्दी व अंग्रेज़ी और कम्प्यूटर शिक्षा की व्यवस्था करे ।
4. माँ-बाप अपनी ज़मीन व जायजात में लड़कों के साथ लड़कियों को भी हिस्सा दें।
5. ’’ज़कात’’ का इजतिमाई निज़ाम (सामूहिक व्यवस्था) का़यम किया जाये, ’’साहिबे निसाब’’ (मालदार इस्लामिक दृष्टिकोण से) मुसलमान अपनी ’’ज़कात’’ को एक जगह इकट्ठा करें, ताकि उसके माध्यम से ग़रीब, मिस्किन और बेसहारा लोगों की मदद की जा सके।
केन्द्र सरकार व राज्य की सरकारों को हिदायत
1. मुल्क़ की सालमियत यानि देश की एकता व अखण्डता पर काम करने वाली श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार या अन्य सरकारे हो, उनके साथ हम काँधे से काँधा मिलाकर काम करने के लिये तैयार है।
2. सरकारों द्वारा अल्पसंख्यकों के उत्थान हेतु बहुत सारी स्कीमें बनाई है, मगर हक़ीक़त ये है कि इन स्किमों का कोई भी फायदा मुसलमानों को हासिल नहीं होता है, इसकी व्यवस्था में बदलाव किया जाये।
3. बेकसूर उलेमा और मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारियों पर विराम लगाई जाये, इससे मुसलमानों के दरमियान असुरक्षा की भावना फैल रही है और विश्व में भारत की छवि धूमिल हो रही है।
4. लव-जिलाद, माॅब-लिंचिंग, धर्मान्तरण, टैररफण्डिंग और आतंकवाद के नाम पर मुसलमानों को भयभीत व परेशान किया जा रहा है, इस पर फौरी तौर से रोकथाम होना चाहिये।
5. चन्द कट्टरपंथि संगठन सरकारों की सरपरस्ती के बलबूते गाँव-देहात के कमज़ोर मुसलमानों की लड़कियों को डरा धमकाकर और लोभ लुभावने सपने दिखाकर शादी की मुहीम चला रहे है, जिससे हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक सौहार्द को ख़तरा लाहिक़ हो सकता है।
6. मुसलमानों को आर्थिक आधार पर सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाये।
7. ’’सबका साथ-सबका विकास’’ का नारा देने वाली हुकूमतों में सिर्फ एक विशेष समुदाय को प्रतिनिधित्व दिया गया है, जो कुल मुस्लिम आबादी का सिर्फ एक फीसद हिस्सा हैं, जबकि सुन्नी सूफी बरेलवी मुसलमानों की आबादी बहुसंख्यक है मगर इनको केन्द्र या राज्य में कही भी नुमाईन्दगी नहीं दी गई है। आखिर इस बड़े समुदाय को नज़र अन्दाज़ करने की क्या वजह है।
8. उत्तर प्रदेश के मदरसों में आधुनिक टिचरों की तंख्वाह साल भर से नहीं आई है जिससे परिवार को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, हुकूमत फौरी तौर पर तंख्वायें ज़ारी करे।
9. केन्द्र सरकार व राज्य सरकारे सभी समुदाय को साथ लेकर चले, और किसी समुदाय के साथ भेदभाव न करें, और सुन्नी सूफी बरेलवी मुसलमानों को हुकूमत में नुमाइन्दगी  दे ।
राजनीतिक पार्टियों को हिदायत:-
1. राजनीतिक पार्टियाँ अपनी ज़रूरत के वक़्त और वोट लेने के लिये मुसलमानों को इस्तेमाल करती है, फिर सरकार बना लेने के बाद भूल जाती है, इसलिये उनको अपने काम करने के तरीकों में बदलाव लाना होगा।
2. मुसलमान किसी भी एक राजनीतिक पार्टी का गुलाम नहीं है, अब राजनतिक पार्टियाँ और उनके नेता मुसलमानों को बधुँआ मज़दूर न समझें।
3. जो पार्टी मुसलमानों के लिये काम करेगी, मुसलमानों के मसाइल और उनके अधिकारों पर ध्यान देगी, मुसलमान उसके साथ खड़ा होगा।

बैठक में मुख्य रूप से इन उलामाअें ने शिरकत की, और कुछ लोगों ने वर्चुअल भाग लिया। ग्रांड मुफ्ती आफ इण्डिया के प्रतिनिधि मुफ्ती सादिक़ सका़फी केरला, मौलाना मज़हर इमाम बंगाल, मौलाना अब्दुस्सलाम कर्नाटक, मौलाना रिज़वान आन्ध्र प्रदेश, मुफ्ती शाकिरूल का़दरी राजस्थान, मौलाना ज़ाहिद रज़ा रज़वी उत्तराखण्ड, कारी सग़ीर अहमद रज़वी देहली, उत्तर प्रदेश से मुफ्ती सुल्तान रज़ा बहराइच, हाफिज़ नूर अहमद अज़हरी पीलीभीत, मौलाना आज़म अहशमती लखनऊ, मौलाना मुजाहिद हुसैन, मौलाना ताहिर फरीदी बरेली आदि उपस्थित रहे।

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