बरेली।संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर को जब 14 अप्रैल 1990 को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा गया, तब पूरा राष्ट्र उनके संघर्ष, विचार और सामाजिक योगदान के प्रति नतमस्तक हो उठा। बाबा साहब से जुड़ी ऐसी ही एक ऐतिहासिक और भावनात्मक स्मृति 30 मई 2003 को बरेली में भी दर्ज हुई, जब उनकी धर्मपत्नी डॉ. सविता अंबेडकर, जिन्हें लोग स्नेह से माई अंबेडकर कहते थे, शहर पहुंचीं।

डॉ. सविता अंबेडकर बरेली बार एसोसिएशन के निवर्तमान अध्यक्ष मनोज हरित के पारिवारिक आमंत्रण पर यहां आई थीं। इस दौरान उन्होंने करीब सात घंटे हरित परिवार के निवास पर बिताए। यह प्रवास आज भी बरेली के सामाजिक और ऐतिहासिक प्रसंगों में विशेष स्थान रखता है।

सादगी और सहज स्वभाव के लिए पहचानी जाने वाली माई अंबेडकर ने उस दिन अपनी सरलता से सभी को प्रभावित किया। उन्हें साधारण जीवनशैली पसंद थी। वे सामान्य साड़ी पहनती थीं और भोजन में दाल-चावल व गुड़ को प्राथमिकता देती थीं। हरित परिवार के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने बाबा साहब के निजी जीवन से जुड़े कई प्रसंग साझा किए, साथ ही अपने जीवन के अनुभव भी बताए।
मनोज हरित के अनुसार, सविता अंबेडकर ने उस समय बताया था कि उन्होंने डॉ. अंबेडकर से विवाह उनकी सेहत को ध्यान में रखते हुए किया था। बाबा साहब अक्सर अस्वस्थ रहते थे और वे नहीं चाहती थीं कि वे अकेले पीड़ा सहें। उनकी सेवा और देखभाल के भाव से ही उन्होंने विवाह का निर्णय लिया, हालांकि उनके परिवार को यह रिश्ता स्वीकार नहीं था।
सविता अंबेडकर ने यह भी कहा था कि वे अनुसूचित समाज के सभी लोगों को बाबा साहब का परिवार मानती हैं। उनके इन शब्दों से स्पष्ट था कि बाबा साहब का संघर्ष केवल संवैधानिक दस्तावेजों तक सीमित नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और सामाजिक चेतना से जुड़ा था।
मनोज हरित बताते हैं कि माई अंबेडकर ने बाबा साहब के अनुशासित, शांत और नियमबद्ध जीवन से जुड़े कई किस्से भी सुनाए। उन्होंने बताया कि डॉ. अंबेडकर जीवनभर सादगी और अनुशासन को सर्वोपरि मानते रहे।उस दिन मौसम में ठंडक महसूस होने पर हरित परिवार की ओर से उनकी मां ने माई अंबेडकर को एक शॉल भेंट की थी, जिसे वे बरेली से लखनऊ जाते समय अपने साथ ले गईं। हरित परिवार ने आज भी उन पलों की स्मृतियों को संजोकर रखा है।
जिस कप में उन्होंने चाय पी और जिन बर्तनों में भोजन किया, उन्हें परिवार ने अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखा है, ताकि बाबा साहब के परिवार की समाज के प्रति भावना को याद रखा जा सके।
मनोज हरित ने यह भी बताया कि उस समय स्थानीय समाचार पत्रों में माई अंबेडकर के आगमन को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया था। बरेली और हरित परिवार के लिए यह प्रवास केवल एक साधारण मुलाकात नहीं, बल्कि इतिहास का ऐसा भावुक अध्याय है, जो आज भी स्मृतियों में जीवंत है।




