आज़ादी सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, समाज परिवर्तन का सपना था

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लेखक । संजीव मेहरोत्रा,

*आज़ादी का अर्थ अभी बाकी है*

*सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा,*
*हम बुलबुलें हैं इसकी, ये गुलिस्ताँ हमारा।”*
— *मुहम्मद इक़बाल*

*15 अगस्त* केवल तिरंगा फहराने और राष्ट्रगान गाने का दिन नहीं है। यह उन लाखों स्त्री-पुरुषों को याद करने का दिन है जिन्होंने एक ऐसी आज़ादी के लिए संघर्ष किया था जिसमें भारत केवल अंग्रेज़ी शासन से मुक्त न हो, बल्कि *भूख, गरीबी, शोषण, साम्प्रदायिकता और अन्याय से भी मुक्त हो।*

*हसरत मोहानी* ने “*इंक़लाब ज़िंदाबाद*” का नारा दिया। *भगत सिंह* और उनके साथियों ने इसे जनसंघर्ष की आवाज़ बनाया। यह केवल सत्ता बदलने का नारा नहीं था—*यह समाज बदलने का सपना था।*

लेकिन आज़ादी की सुबह को *फ़ैज़* ने बहुत पहले ही एक बेचैन सवाल में बदल दिया था—

“*ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर,*
*वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं।”*

आज, 79 वर्ष बाद, हमें अपने आप से पूछना चाहिए—*क्या हर भारतीय वास्तव में बराबर आज़ाद है?*

*क्या वह किसान आज़ाद है जो कर्ज़ और बाजार के दबाव में जी रहा है?*
*क्या वह बेरोज़गार नौजवान आज़ाद है जिसे रोजगार के बजाय केवल आश्वासन मिलते हैं?*
*क्या वह मजदूर आज़ाद है जिसकी मेहनत से मुनाफ़ा पैदा होता है लेकिन उसके हिस्से में असुरक्षा आती है?*
*क्या वह गरीब आज़ाद है जिसके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य लगातार महंगे होते जा रहे हैं?*

और सबसे महत्वपूर्ण—*क्या वह नागरिक पूरी तरह आज़ाद है जो अपने सवाल सत्ता से पूछने में डरता है?*

*कैफ़ी आज़मी* का सपना था कि आज़ादी का अर्थ आम आदमी की ज़िंदगी बदलना हो। *साहिर* ने भी देशभक्ति को केवल नारों और समारोहों में नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर आदमी की जिंदगी में तलाशा।

इसलिए आज़ादी का अर्थ केवल यह नहीं कि *अंग्रेज़ चले गए।*

आज़ादी का अर्थ है—
*भूख से आज़ादी।*
*बेरोज़गारी से आज़ादी।*
*साम्प्रदायिक नफ़रत से आज़ादी।*
*जातिगत भेदभाव से आज़ादी।*
*शोषण से आज़ादी।*
*डर से आज़ादी।*
*और अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने की पूरी आज़ादी।*

*इक़बाल* ने कहा था—

“*मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,*
*हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा।”*

आज इन पंक्तियों को केवल मंचों पर उद्धृत करने की नहीं, जीने की जरूरत है।

क्योंकि भारत की ताकत उसकी विविधता में है। भारत किसी एक धर्म, भाषा, जाति या विचारधारा की जागीर नहीं है। भारत उन करोड़ों मेहनतकश लोगों का है जिन्होंने खेतों में अन्न उगाया, कारखानों में उत्पादन किया, सीमाओं की रक्षा की, दफ्तरों और बैंकों में काम किया और इस देश की अर्थव्यवस्था को अपने श्रम से खड़ा किया।

इसलिए इस स्वतंत्रता दिवस पर हमारा संकल्प केवल इतना न हो कि हम कहें—

“*भारत माता की जय।”*

बल्कि यह भी कहें—

*भारत के हर नागरिक की जय।*
*मेहनतकश जनता की जय।*
*समानता की जय।*
*धर्मनिरपेक्षता की जय।*
*लोकतंत्र की जय।*
*और उस भारत की जय जिसमें आज़ादी केवल संविधान के पन्नों पर नहीं, हर नागरिक की जिंदगी में दिखाई दे।*

*आज़ादी मिली है—लेकिन आज़ादी को सार्थक करने की लड़ाई अभी जारी है।*

नोट।।यह लेखक के निजी विचार है।

*इंक़लाब ज़िंदाबाद।*
*हिन्दुस्तान ज़िंदाबाद।*

नोट।।यह लेखक के निजी विचार है।

 

 

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Author: newsvoxindia

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