बहेड़ी में रमज़ान की 27वीं शब एक यादगार और रूहानी पल बन गई, जब शहर के मारूफ़ हाफ़िज़ अनवार अहमद क़ादरी ने तरावीह में 50वीं बार ख़त्म-ए-क़ुरआन मुकम्मल कर एक नया इतिहास रच दिया। वर्ष 1975 से शुरू हुआ यह मुबारक सफर आज आधी सदी की शानदार इबादत में तब्दील हो चुका है।

अपने इस लंबे सफर में उन्होंने 25 बार मोती मस्जिद, 16 बार बाज़ार वाली मस्जिद बहेड़ी, 6 बार बैंगलोर, 2 बार शीशगढ़ और 1 बार बरेली में क़ुरआन-ए-पाक सुनाने की सआदत हासिल की, जबकि दो बार शबीना में अकेले पूरा क़ुरआन पढ़ने का सौभाग्य भी प्राप्त किया। इस ऐतिहासिक मौके पर मोती मस्जिद में आयोजित जश्न-ए-ख़त्मुल क़ुरआन में उलेमा और अकीदतमंदों की बड़ी तादाद जुटी, जहां मौलाना राशिदुल क़ादरी, मुफ़्ती काशिफ सईद और मौलाना साबिर मियां समेत कई विद्वानों ने हाफ़िज़ अनवार साहब की दीनी, मिल्ली और सामाजिक सेवाओं को सराहते हुए उन्हें एक मिसाल करार दिया।
नात व मनक़बत की पेशकश से महफिल रूहानी रंग में डूबी रही और आखिर में लंगर व मिठाई तक़सीम कर मुल्क में अमन-ओ-चैन की दुआ की गई। यह उपलब्धि पूरे इलाके के लिए फख्र और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन गई है।



