
मोहम्मद आदिल
बरेली ।दरगाह आला हज़रत के मरकज़ी दारूल इफ्ता के मुफ्ती अब्दुर्रहीम नश्तर फारूक़ी ने बताया कि अमूमन लोग मगरिब की अज़ान सुन कर पहले इफ्तार की दुआ पढ़ते हैं फिर इफ्तार करते हैं जबकि दुआ इफ्तार के बाद पढ़नी चाहिए। इस सिलसिले में इमामे अहले सुन्नत सरकार आला हज़रत इर्शाद फरमाते है कि दलील यह है कि दुआ रोज़ा इफ्तार करके पढ़े। इफ्तार की दुआ (अल्लाहुम्मा लका सुमतु व बिका आमन्तु व अलैका तवक्कलतु व आला रिजकीका अफतरतु ) यानी ऐ अल्लाह मैंने तेरे लिए रोजा रखा और तुझ पर ईमान लाया और तुझ पर भरोसा किया और तेरे ही दिए हुए रिज़्क पर इफ्तार किया) हदीसे पाक में आया है कि हुज़ूर नबीये करीम सल्ललाहु अलैहि व सल्लम पहले इफ्तार फरमाते फिर यह दुआ पढ़ते। (फतवा-ए-रजविया की जिल्द 10, सफा 634) इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि इफ्तार के वक़्त बिस्मिल्लाह पढ़ कर खजूर या पानी से इफ्तार करें फिर इफ्तार की दुआ पढ़ें। उन्हों ने हदीसे पाक के हवाले से आगे बताया कि इफ्तार का वक़्त दुआ क़बूल होने के मकबूल तरीन वक्तों में से एक है, इस वक़्त अल्लाह तआला कोई भी दुआ रद्द नहीं फ़रमाता। इस लिए अपने तमाम जायज़ मकासिद में कामयाबी के लिए इस वक़्त ख़ुसूसी दुआ का एहतिमाम ज़रूर करें । यह जानकारी जमात रज़ा ए मुस्तफा के मीडिया प्रभारी समरान खान ने न्यूज वॉक्स को प्रेस रिलीज के माध्यम से दी है।




